Tuesday, April 13, 2010

गुड़िया...

एक गुड़िया रेशमी बालों वाली,
ऊपर नीचे करने पर,
आँखें मटकाने वाली,
वो जिसका चेहरा हमेशा खिला रहता,
जिसके साथ दिल बहला रहता,
अब कुछ खोई-खोई रहती है,
वो गुड़िया कहीं दिखाई नहीं देती है!

उसके रबर से नरम चेहरे पर जैसे,
ऊपरवाले ने भी
मुस्कान को सिलकर भेजा था,
हर किसी से यूँ हँसकर मिल जाती,
हँसी के आगे नफ़रत पिघल जाती,
वो निश्छल बच्चों के रूठे मन को
चुटकियों में प्रफ्फुलित करके
उनके संग गुड्डा-गुड्डी के खेल में,
कल्पनाओं की सैर पर निकल जाती!
अब कुछ उलझी-उलझी रहती है,
वो गुड़िया कहीं दिखाई नहीं देती है!!



बचपन वाली उस गुड़िया के,
कड़क होने पर भी
हाथ कहीं, पैर कहीं रहते,
उसकी हरकतें आकर्षित करने वाली,
बेपरवाही और बेफ़िक्री से रहने वाली,
बदलती ऋतुओं के असर से परे वो,
हरदम एक सी रहकर भी
अपने उद्देश्य को पहचान बनाकर
एक गुड़िया का अस्तित्व निभाने वाली,
अब ज़रा व्यथित-कुंठित सी रहती है,
वो गुड़िया कहीं दिखाई नहीं देती है!!!

क्योंकि गुड़िया के साथ सब बदल गया है...

उसके नरम रबर के पीछे माँस चढ़ गया है,
वक्त के साथ अनुभव का काँटा गढ़ गया है,
कई गुड्डे-गुड्डियों के साथ मिलकर,
भैया-दीदी, दोस्त-सहेली, प्रेमी को पाकर
एक परिवार बनाया था उसने, जो बिछड़ गया है,

ज़िंदगी के चुंगल में फँसी गुड़िया,
अब सब रिश्तों से डरती है,
घुट-घुट कर अब वो मरती है,
अब जान गए हैं लोग भी देखो

के आख़िर क्यों???

वो खेलती-मुस्काती, सबको अपना बनाती
अब कुछ उलझी-खोई,
व्यथित-कुंठित सी रहती है
वो गुड़िया कहीं दिखाई नहीं देती है!!!
वो गुड़िया कहीं दिखाई नहीं देती है!!!

~ पंकज

चित्र ~ हमेशा की तरह गूगल महाराज की ओर से...सधन्यवाद!

Tuesday, February 16, 2010

वैलेंटाइन पर मधुमक्खियों की पप्पियाँ - BEE My Valentine!


ट्रैंकिंग की अपनी पिछली पोस्ट में मैंने अभिनय के सांगहँस (संघर्ष) की बात की थी। लेकिन इस बार की ट्रैंकिंग असली संघर्ष में तब्दील हो गई। पिछली बार जहाँ सीधे-सपाट रास्ते होते हुए इंदौर के पास च्यवनऋषि के आश्रम तक गए थे। वहीं इस बार हमने सिमरोल के आगे जूना पानी को अपना गंतव्य बनाया था। सभी उ‍त्साहित थे क्योंकि हमें दो पहाड़ों को पार करके लगभग 7 किमी का रास्ता तय करना था। यकीन मानें, जूना पानी तक पहुँचने का रास्ता वाकई चुनौतियों भरा रहा जहाँ तक हम पतली सी पहाड़ी पगडंडिंयों पर फिसलन भरे पत्थरों से बचते-बचाते पहुँचे थे। रास्ते का ये संघर्ष तो हर ट्रैंकिंग का हिस्सा होता है। किंतु असली संघर्ष तो जूना पानी के कुण्ड तक पहुँचने के बाद ही शुरू हुआ। और वहाँ से वापस लौटने की कहानी भी जीवनभर याद रहने लायक बन गई।

वैलेंटाइन डे पर कहीं ट्रैंकिंग पर जाना कुछ लोगों को अजीब लगेगा। लेकिन उन्हें क्या फ़र्क पड़ता है जिनका कोई वैलेंटाइन ही ना हो :D । ख़ैर तो हम भी ऐसे ही करीब 40 लोगों की जमात में शामिल होकर चले गए ट्रैंकिंग के लिए। सिमरोल से आगे मेहंदी बागोदा में गाड़ियाँ रखकर हम लोग 2 किमी पैदल चलकर पहाड़ तक गए, और फिर 1 किमी खड़े उतार से होकर नीचे गए। वहाँ से लगभग 2 किमी फिर अगले पहाड़ पर चढ़ाई की और फिर 1 किमी नीचे जाकर हमें जूना पानी का कुण्ड भी दिखाई दिया। इन्हीं पहाड़ी इलाकों में हमें 4-5 चंचल हिरणियों का झुण्ड भी इठलाता हु्आ पहाड़ों पर मस्ती करता हुआ दिखाई दिया। अद्भुत दृश्य था वो भी। ख़ैर ये आंनद का परिदृश्य जल्द ही दर्दनाक अनुभव में तब्दील हो गया जब जूना पानी कुण्ड में नहाते समय हम पर मधुमक्खियों ने हमला कर दिया। मधुमक्खियाँ नहीं भमरमाल कहिए (यह मधुमक्खियों की देशी प्रजाती होती है-मोटी मोटी और बड़ी घातक)। आगे क्या हुआ होगा ये पढ़ने के पहले ही शायद आपको हँसी आ जाए फिर भी आपको ये अनुभव सुनाना मुझे बहुत ज़रूरी लग रहा है!

कच्छे-बनियान और गीले शरीर के साथ में मधु‍मक्खियों ने हम पर क्या असर छोड़ा होगा ये तो आप अंदाज ही लगाइए। किसी की दुआ ही रही होगी कि हम बच गए और 10-15 मक्खियों को ही मेरे ख़ून का स्वाद चखने का मौका मिला। क्योंकि उनसे बचने के लिए हम लगभग 1 घंटे तक कड़कते ठंडे पानी में बिना किसी हलचल के लेटे रहे। शुरू में जैसे ही मधुमक्खियों का हमला हुआ हम पानी से बाहर भागे ताकि भागमभाग में कोई डूब ना जाए। लेकिन जैसे ही मैं बाहर की ओर भागा मानो उलटा भूत माथे चढ़ गया। यकीनन मेरे भागने से ज़्यादा स्पीड उन जीवों की थी जिन्हें इस बार मधुरस से ज़्यादा स्वाद हमारे ख़ून में आ रहा था। बाहर निकलते ही मुझे अभिताभ बच्चन के पाडांस की याद आ गई और मेरे भी दोनों हाथ कभी अपने सर पर, तो कभी सीने पर, तो कभी पीठ को खुजाते रहे। अमिताभजी और मेरे डांस में बस फ़र्क इतना रहा कि वे मनोरंजन में नाचे थे और हम रूदन में नाच रहे थे। और यकीनन इस अनोखे डांस में हमारी स्पीड भी उनसे 10 गुना अधिक ही थी। इसलिए मुझे वापस पानी में लौटना पड़ा।

वैलेंटाइन डे पर सुबह अपनी माँ को प्यारी सी पप्पी देकर घर से निकलते वक़्त ये ज़रा भी ख़्याल नहीं था कि आज हमें और कितनी पप्पियाँ मिलने वाली हैं। यूँ तो मैं प्यार के ऐसे झमेलों से सदा ही दूर रहा हूँ। किंतु अगर कोई आकर ख़ुद ज़बरदस्ती कर जाए तो क्या किया जा सकता है। 14 फ़रवरी 2010 को भी कुछ ऐसा ही हुआ। हमें अकेला पाकर मधुमक्खियों ने तो ऐसे हमला किया जैसे उनमें होड़ लग गई हो कि ये जनाब हमारे हैं और वो ख़ातून हमारी हैं। वो लाल ड्रैस वाली को मेरी पप्पी मिलेगी तो किसी ने कहा... अरे! वो सफ़ेद बनियान वाला जवान मेरा है!!! मुझे भी कुछ मधुमक्खियों ने मौका पाकर घेर ही लिया। उन्हें तो जैसे मेरा सामूहिक बलात्कार करना था। मेरे पास आकर सीधे अपने प्यार का इज़हार कर दिया उन कमबख़्तमारियों ने। दो-चार तो मेरे मुँह में जाकर ब्रह्मांड घूम आईं जैसे मैं बाल कृष्ण हूँ। वे सब तो जेट स्पीड में आईं और कहा पंकज..... वी लव यू, वी लव यू, WE LOVE YOU.... पुच्च्च्च...पुच्च्च्च...पुच्च्च्च...पुच्च्च्च...पुच्च्च्च!!!!! और ऐसी पप्पियाँ दीं कि बाद में अगर मैं चाहता भी तो वैलेंटाइन डे पर (अग़र ग़लती से कोई मिल जाती तो भी) अपने प्यार का इज़हार करके उसे पप्पी नहीं दे सकता था। पप्पी तो छोड़िये झप्पी देने का भी मन नहीं होता।

ख़ैर भमरमाल का आतंक थमते ही हम वहाँ से निकलने को तैयार हो गए और जिसके हाथ में जिसका सामान आया लेकर ऊपर चढ़ने लगे। मोबाइल के सिग्नल मिलते ही सबसे पहले इंदौर के साथियों को और 108 पर एम्बूलेंस को ख़बर की गई। हमारे पूरे समूह की औसत आयू लगभग 28-30 के बीच रही होगी। चढ़ाई शुरू करते ही एक महाशय ने तो ‍इतना तक कह दिया कि मुझे मर जाने दीजिए और आप लोग आगे बढ़ जाइए। पर यूथ होस्टल के साथियों का जज़्बा यूँ ही नहीं हारने वाला था। और ऊपर से ख़बर लगते ही गाँव वाले भी ताबड़तोड हमारी मदद के लिए आ चुके थे। उन महाशय के लिए बम्बूओं के सहारे शैया बनाई गई और उन्हे ऊपर लाया गया। बाक़ी साथियों को एक-दूसरे के सहारे ऊपर तक लेकर आए। हम जैसे कुछ लोग जो मधुमक्खियों का अधिक आहार नहीं बने थे, वे दरअसल दूसरों का सहारा बनने में अधिक पस्त हो चुके थे। फिर भी ये संघर्ष जीत ही लिया सभी ने।

घायलों और घबराए हुए साथियों को अस्पताल पहुँचाने के बाद मेरी भी सांस फूल गई थी। इस पूरी दुर्घटना में जितना शारीरिक त्रास हुआ उससे कही अधिक प्रभाव मानसिक तौर पर हुआ था। मनौवैज्ञानिक तौर पर अंत में सभी पस्त हो चुके थे। लेकिन ख़ुशी इस बात की थी कि कुछ भी अनहोनी नहीं हो पाई।

दोस्तों और जानने वालों को जब ये ख़बर मिली तो उन्हें मेरे चाँद से रौशन चेहरे को देखने की लालसा जाग उठी। ख़ैर मुझे देखकर उन्हें निराशा ही हाथ लगी क्योंकि उस रात को इतना असर नहीं हुआ था। अगली सुबह तो ख़ुद का चेहरा भी पहचाना नहीं जा रहा था। हाथ-पैरों की अकड़न अलग। इसलिए ही तत्काल ये पोस्ट नहीं लिख पाया। चूँकि अब सब कुछ सामान्य हो गया है। ये अनुभव आपकी नज़र पेश कर दिया हमने। इसी बहाने वैलेंटाइन पर मिली ये अनोखी पप्पियाँ हमेशा याद रहेंगी। अब इस वाकिये पर हँसना है या सहानुभूति देना है ये आप पर है। ख़ैर मुझे तो हँसी ही आ रही है। सो आप भी बेतकल्लुफ़ हो जाइए। Just BEE Happy. :D

अरे हाँ! यदि किसी लड़की को ये अनुभव पसंद आया हो तो मैं यही कहूँगा "Will you BEE My Valentine"!!!

चित्र: हमेशा ‍की तरह गूगल से साभार!

Sunday, February 7, 2010

भारतीय सेंसरशिप का दायरा बढ़ाती ‍इश्क़िया

चंद दिनों पहले ही विशाल भारद्वाज प्रोडक्शन की ‍इश्क़िया देखने का मौका मिला। मौका हालाँकि मिला नहीं ख़ुद बनाना पड़ा। क्योंकि जब से इस फ़िल्म की चर्चा शुरू हुई तभी से इसे देखने की इच्छा के बीज तो मन में अंकुरित होने लगे थे। हाल ही की अपनी भोपाल यात्रा पर आख़िरकार यह फ़िल्म देख ही डाली। जो चर्चा इस फ़िल्म को लेकर शुरू हुई वो इसकी देसी बोली, खाटी संवाद, बोल्ड दृश्यों, पटकथा और ख़ासकर इस पूरी फ़िल्म की सेंसरशिप को लेकर थी। और फ़िल्म देखने के बाद यही कहूँगा कि ये चर्चाएँ काफ़ी हद तक वाजिब भी थीं। इस तरह की फ़िल्में भारतीय परिदृश्य में वाकई चर्चा का विषय ही बनेंगी।

फ़िल्म की सबसे बड़ी बात इसके संवाद और इसे बनाए जाने का तरीका रहा है। ठेठ देसी शब्दों और गालियों से भरे सीधे और स्पष्ट संवादों के बावजूद इसे भारतीय सेंसर ने पास कर दिया। हालाँकि इसे सर्टिफ़िकेट दिया गया, लेकिन निर्देशक अभिषेक चौबे उसमें भी ख़ुश थे। ख़ुशी इस बात को लेकर कि सेंसर द्वारा उनसे जवाब तलब नहीं किया गया और उन्हें उनके फ़ाइनल प्रोडक्ट से छेड़छाड़ कर उसमें आमूलचूल परिवर्तन करने को नहीं कहा गया। वैसे भी अभिषेक तो पहले ही कह चुके थे कि उन्होंने ये फ़िल्म बच्चों के लिए नहीं बनाई है।

यहाँ आकर इस प्रकार की बातों ने मन को उद्वेलित भी किया और आनंदित भी। उद्वेलित इसलिए कि क्या मेनस्ट्रीम बॉलीवुड और भारतीय दर्शक ख़ासतौर पर अब इस सबके लिए तैयार हैं! और आनंदित इसलिए क्योंकि अब ऐसा लगने लगा है कि भारतीयता की सेंसरशिप का दायरा बढ़ रहा है। अब विवाद कुछ कम होते जा रहे हैं। वैसे, जब से इस फ़िल्म की सेंसरशिप पर बहस चल रही थी तभी से भारतीय परंपरा, संस्कृति और उसके अनुसार हमारे आम जीवन में होने वाली सेंसरशिप की यादें ताज़ा होने लगी थीं। जैसे घर में मनपसंद कपड़े पहनने पर सेंसरशिप, शॉपिंग के दौरान मनपसंद गैजेट ख़रीदने पर सेंसरशिप, खाने-पीने की चीज़ों में सेंसरशिप, स्कूल में मस्ती करने पर सेंसरशिप। टीचर, माता-पिता, बड़े भाई-बहन, रौबदार दोस्त, पत्नी, या प्रेमिका की थोपी हुई सेंसरशिप! अपने परिवेश में तो इस तरह की चीज़ों का अनुभव यकीनन सभी ने किया होगा??? और उन्हीं अनुभवों की बदौलत ये पोस्ट निकली है।

मुझे याद आता है, जब स्कूल में वार्षिकोत्सव हुआ करते थे। तब हमारी कोशिश रहती थी कि उस समय के ‍चर्चित गानों पर हम क्लास के लड़के-लड़कियाँ मिलकर गज़ब का डांस तैयार करें। लेकिन फ़िर ऐन मौकों पर हमारे डांस में से लड़कियों को सेंसर कर दिया जाता था। और हम इस बात के लिए लड़ा करते थे। उस समय तर्क होता था कि लड़के-लड़कियाँ साथ में इस तरह नहीं नाच सकते। ख़ैर फिर भी हमें एक दो बार तो ये मौका नसीब हो ही गया था। इस वाकये को याद करने का कारण यही था कि यह देखा जाए कि हम किस हद ‍तक अपनी बातों में, कामों में, या अपनी इच्छाओं में अपने परिवेश और संस्कृति के हिसाब से काँट-छाँट करते आ रहे हैं। और अब इनके बावजूद इश्क़िया जैसी फ़िल्म को बड़े परदे पर उसके मूल स्वरूप में देखना एक अलहदा अनुभव है।

बात यही है कि हम खुल रहे हैं और प्रैक्टिकली एडजस्ट होते जा रहे हैं। और कला के माध्यम से हम अपनी सोच के दायरे को बढ़ाने में सफल हो रहे हैं। इसका ये मतलब कतई मत निकालिए कि हमें अपने मूल्यों और संस्कृति और उस परिवेश से प्यार नहीं है, जहाँ इस तरह की बातें और फ़िल्में वर्जित श्रेणी में आती हैं। अलबत्ता अब हम उन चीज़ों से मुँह नहीं चुरा रहे हैं। विशेष तौर पर कला के संबंध में।

विशाल भारद्वाज मक़बूल, ओंकारा, और कमीने से अपनी फ़िल्म फ़ैक्टरी से बिलकुल अलग प्रोडक्ट ‍निकालने का ट्रेंड शुरू कर चुके हैं। इश्क़िया ने इस सूची को और आगे बढ़ाने का काम बख़ूबी किया है। बिना किसी बड़ी स्टारकास्ट के बावजूद भी विशाल ने अभिषेक जैसे अपने सहयोगी के हाथ इस फ़िल्म के निर्देशन की बागडोर देकर यही जताया है कि आज भी सिर्फ़ नाम नहीं बल्कि काम बिकता है। युवा निर्देशक अभिषेक ने भी बड़े खुले दिल से इस फ़िल्म को बनाया है, जिसके लिए उन्हें तारीफ़े मिलनी ही चाहिए। हालाँकि दो घंटे की इश्क़िया में बहुत कुछ है, पर जो बात मुझे हमेशा याद रहेगी वो यही है कि इश्क़ में सब बेवजह होता है। और इसी संवाद से पूरी फ़िल्म की कहानी और इसमें बुने पात्रों के व्यवहार की असली वजह का ख़ुलासा होता है।

ख़ैर उम्मीद तो यही है कि अब स्कूलों में लड़के-लड़कियों को एक साथ नाचने के लिए सोचना नहीं पड़ता होगा!!! और अब हम सेंस‍रशिप को केवल कैंची चलाने की विधा के रूप में नहीं जानेंगे। बल्कि उसका उद्देश्य यही होगा कि नैतिक रूप से अनुचित बातों पर उंगली उठाना, और जिस कथा को हम आइने की तरह समाज के सामने ला सकते हैं उसे बिना रोक-टोक के आगे आने देना।

बहरहाल इश्क़िया देखिएगा और अपनी-अपनी व्यक्तिगत जीवन में होती रहने वाली सेंसरशिप का मज़ा लिजिएगा।

Tuesday, January 26, 2010

जीवन, अभिनय, और बड़ा होना एक SONGहँस है।


अगर मैं इसे सीधे और स्पष्ट शब्दों में इस प्रकार लिखूँ कि जीवन, अभिनय, और बड़ा होना एक संघर्ष है तो आपको समझने में ज़रा भी परेशानी नहीं होगी और आप इससे सहमति भी जता देंगे। तो फिर ये SONGहँस और संघर्ष का क्या तालमेल??? वाकई अजीब कहानी है!!! इसलिए तो बैठ गया इसको शब्दों में पिरोने के लिए। कई लोगों से सुना है कि क्रिएटिविटी यानि कल्पनाशीलता कहीं से सीखी नहीं जा सकती वो तो विचार स्वरूप आपके अंदर बसती है और समय-समय पर ऊछलकर आपके सामने कूद पड़ती है। मेरे साथ कुछ ऐसा ही हुआ जिसने कल्पनाशीलता के असीमित होने का अहसास करा दिया। 24 जनवरी 2010 का दिन जब इंदौर की यूथ होस्टल यूनिट के साथ बड़वाह के पास च्यवनऋषि और मोदरी माता के आश्रम ट्रैकिंग पर जाने का कार्यक्रम बना।

कई दिनों बाद जंगल में भटकने का मौका मिला तो उसे छोड़ने का मन नहीं किया। रविवार के दिन अलसुबह तैयार होकर लगभग 80 लोगों के साथ एक बस में सवार होकर इस दिन को प्रकृति की शांति और सौंदर्य के बीच बिताने के लिए निकल लिया। लेकिन ये नहीं पता था कि इस यात्रा पर प्रकृति, सौंदर्य, शांति, पहाड़ों के अलावा कोई और बात होगी जो जिंदगी भर हमेशा याद बनकर रहेगी। यहाँ उन्हीं यादों को बाँट रहा हूँ।

इन 80 लोगों के झुण्ड में 4 लोग बिलकुल एकतरफ़ा हो गए थे। या फिर ये कहूँ कि खो गए थे अपने आप में और रास्ते का समय काटने के लिए खेले जाने वाले उनके अनोखे खेल में। बस में एक तरफ़ अं‍ताक्षरी शुरु हो चुकी थी। कुछ देर हम भी खेले और फिर बाद में सोचा कि बचा-कुचा समय काटने के लिए हम वो बचपन वाला खेल खेलते हैं जिसमें मूक अभिनय के माध्यम से अपनी टीम के व्यक्ति को एक फ़िल्म का नाम बताना होता है। Dumb Sheraz  कहते हैं इस खेल को।

शुरू में तो बस मस्ती करने के लिए इसे खेलना शुरू किया, लेकिन बाद में यही खेल दिन को यादगार बनाने का कारण बन गया। मैं इसकी मात्र दो उदाहरण बताता हूँ जो ये बताने के लिए काफ़ी हैं कि कल्पना की कोई सीमा नहीं हो सकती कोई बंधन नहीं हो सकता

  • यदि आपको कहा जाए कि अक्षय कुमार की फ़िल्म संघर्ष को मूक अभिनय करके दर्शाइए तो आप क्या करेंगे??? कल हमने क्या किया ये सुनिए! ये नाम हमने अपने विरोधियों को दिया था। तो उनमें से अभिनय करने वाली दोस्त ने सबसे पहले तो गाना गाने के हाव भाव बनाए और फिर अचानक हँसने लगी। बाद में गाना बन गया “Song और फिर हँसने से हँस को अलग किया गया। अब इन दोनों को मिलाकर बना “Songहँस। अब आया असली ट्विस्ट जिस प्रकार मरा-मरा के लगातार उच्चारण से रामनिकलता है, वैसे ही Songहँस को निरंतर अलग-अलग तरह से हिंदी, अंग्रेज़ी, पंजाबी, बांग्ला में बोलते रहने पर निकला संघर्ष और उन्हें उत्तर मिल गया।
  • अब हमें फ़िल्म ब्लफ़मास्टर का नाम बताना था कैसे किया जाए??? तो सबसे पहले बल्ब सुझाया फिर उसे इंदौरी स्टाईल में बलफ़ किया। मैं से मा निकाला। सिर से , टांग से और रम से निकाला। और इन सबको जोड़कर बन गया बलफ़मासटर फिर इसे अंग्रेज़ी लहजे में बुलवाने पर आया ब्लफ़मास्टर
  • अब वास्तव, वजूद, बेताब, मि. एंड मिसेज़ अय्यर, मिशन इंस्तांबुल, घातक, काबुल एक्सप्रेस, ग़ुलाम-ए-मुस्तफ़ा जैसे नामों के लिए क्या-क्या किया गया होगा ये आप ख़ुद कल्पना कीजिए!!!!


    ऐसे उत्तर मिलने के बाद ख़ुद की सोच और उसे क्रियान्वित यानि कि एक्ज़िक्यूट करने के पागलपन पर हँसी तो आनी ही थी। हँसी भी इतनी कि पेट की आँतें भी रहम माँगने लगें! अगर आपने भी इस दृश्य को मन ही मन देख लिया है तो आप भी हँस सकते हैं। ठीक वैसे जैसे कि ट्रैक पर गए बाकी साथी हमें देखकर मन ही मन हँस रहे थे और आनंदित भी हो रहे थे। वो भी इस खेल में शामिल तो होना चाहते थे पर चूँकि वो अब बच्चे नहीं थे बड़े हो गए थे, इसलिए इस खेल में शामिल नहीं हुए। वाकई बड़े होने पर इच्छाओं को मारना सीख जाते हैं हम।

    ख़ैर, कल दिनभर यही सिलसिला चलता रहा और शाम हो गई। इंदौर पहुँचते-पहुँचते भी ना जाने कितनी ही फ़िल्मों के नाम इसी तरह से समझने या समझाने की कोशिश करते रहे हम लोग। घर जाने तक का मन नहीं किया। ऐसा लगा कि बस ये सफ़र यूँ ही चलता रहे और हम यूँ ही अभिनय करते रहें कल्पना करते रहें।

    ये छोटा सा खेल तो कल एक बहाना बन गया था। बीच-बीच में ये विचार कई बार आता रहा कि यह खेल तो अभिनय और सृजनशीलता के नए मापदंड स्थापित करने का माध्यम सा बन गया है। अंदर से आवाज़ आने लगी कि किस शब्द को कितनी जल्दी और कितने बेहतर या अलग ढंग से समझाया जा सकता है। वाकई बचपन के खेल सिर्फ़ खेल नहीं होते हैं। वो बच्चों को बड़ा बनाने का काम करते हैं उन्हें कुछ, नहीं दरअसल बहुत कुछ सिखाते हैं। लेकिन दुखद ये है कि वही बच्चे जब बड़े हो जाते हैं तो वही सारे खेल फिर से खेलना उन्हें बचकाना सा लगने लगता है!!! अजीब चक्र है इन खेलों का और बचपन का। है ना?

    इंदौर पहुँचते ही हमें ना चाहते हुए भी खेल रोकना पड़ा और हम चारों दोस्त खेल को वहीं छोड़कर घर को निकल लिए उससे मिली यादों के साथ। लेकिन सच ही है अगर आपमें बचपन ज़िंदा है तो खेल आपको कभी नहीं छोड़ता। इसका भी जवाब है। क्योंकि जैसे ही मैंने घर में पैर रखा, टीवी देख रहे मेरे बापू ने मुझसे यही पूछा “अरे! पंकज इस फ़िल्म का नाम क्या है? मैंने उन्हें फ़िल्म का नाम भागमभागबताया और हँसी रोकता हुआ अपने कमरे में चला गया। तब एक बात समझ आई कि चाहे हम कितने ही बड़े क्यों न हो जाएँ, जीवन में कितनी ही भागमभाग रहे, उसके बावजूद भी हमें अपने बचपन के पल जीने का Songहँस जारी रखना चाहिए, और ऐसे पल चुराने के लिए समय के साथ बलफ़मासटरी करते रहना चाहिए।

    तो जब भी मौका मिले खेलिएगा ज़रूर!!!


    सभी चित्र: गूगल से साभार

    Monday, January 25, 2010

    अतीत के पन्नों से... एक बार फिर


    पिछले आठ-नौ महीनों की तड़प आख़िरकार कल रात 3 बजे ख़त्म हुई। नौ महीने के बाद जैसे प्रसव में एक नवजात बाहर आता है ठीक उसी तरह कुछ नया, मेरे भीत‍र से, मेरे विचारों के रूप में मेरी उंगलियों से होते हुए अंतत: शब्दों में ढल ही गया। इसमें इतना समय क्यों लगा कुछ कह नहीं सकता। लेकिन हाँ कल दिनभर के खालीपन, एक प्यारी सी दोस्त से ढेर सारी बातें, आँखों से आँसूओं का बोझ कम होने, एक मग गर्म कॉफ़ी का और हाँ, कैलाश खेर के मेरे सारे पसंदीदा तरानों का योगदान रहा, जो दिमाग़ी गम्मत को शब्दों की बंदी बना पाया!

    जहाँ लिखने की बात आती है, तो हर बार ख़ुद से एक वादा होता है कि इस बार शुरु करने पर रूकना नहीं है। कभी समय का बहाना, तो कभी विचारों की कमी का, तो कभी ख़ुद से लड़ने की मंशा की चलते लिखने का मन नहीं होता। लेकिन इस बार कुछ ज़्यादा हो गया। इस बीते समय के कितने की लम्हे आए जब मैं मन के द्वंद्व को शब्दों में लपेटकर एक अच्छी या बुरी याद के रूप में सज़ा सकता था। कई महीनों बाद फिर से जूनून सवार हुआ तो एक ही बार में 32 किलोमीटर साइकिल चला ली, अभिनय के संसार को तलाशा या कहूँ ख़ुद को, अपनी प्यारी सी भतीजी के बहाने बीते बचपन मे गलियारे में होकर आया, दूरदर्शन पर खेती बाड़ी की बातें भी कर लीं और हिप-हॉप हैंपनिंग काम भी किए, कितनी बातें थीं करने के लिए, पर ग़लती तो हो गई। दुनिया जहान की गम्मत में हिस्सा लेते-लेते ख़ुद की गम्मत के इस कोने से ज़रा, नहीं ज़रा नहीं बहुत दूरी हो गई थी। दोस्तों से बातों-बातों में कई बार कहा कि फिर से कीबोर्ड घिसने की इच्छा हो रही है, उन्होंने स्वागत भी किया हौंसला दिया। फिर ये सब बातें रात के जूनून में तो सर पा छाई रहीं और सुबह इतनी रौशनी होने के बाद भी कहीं गायब हो गईं जिन्हें खोजने की कोशिश भी नहीं की।

    ख़ैर इस बार कोई वादा तो नहीं है करने के लिए लेकिन बने रहने की कोशिश भर तो रहेगी ही। फिलहाल गम्मत पर ये रचना, आप सबके लिए और आपकी टिप्पणियाँ मेरे लिए...
    गम्मत पर मिलते रहेंगे...


    अतीत का आईना...

    देखकर आईने में एक शख़्स नज़र आता है,
    मैं तो खड़ा रहता हूँ और वो मुस्क‍ुराता है,


    हमने तो दिल का हाल कभी कहा नहीं उसे,
    आँखों से कैसे भला कोई मन पढ़ पाता है।


    यूँ तो बंद आँखों में हमेशा एक ख़्वाब पलता है,
    बस आँखें खुलती हैं और वो अधूरा रह जाता है।


    अरसा हुआ उनसे मिलने की तमन्ना सी है,
    वो नहीं बस उनका ख़्याल आकर सताता है।


    कहाँ तो तक़रार उस रिश्ते की पहचान थी,
    आज देखो वही शख़्स मेरा ख़ास कहलाता है।


    कमबख़्त दोस्त ख़ुशी का ठिकाना कहते हैं मुझे,
    फिर क्यों कहीं आँसू झलकने पे मेरा नाम आता है।


    फ़िक्र, द्वेष, घृणा, छल तो आज हर चेहरे पर है,
    वो नन्हा चेहरा आख़िर मासूमियत कहाँ से लाता है,


    बचपन में बारिश हमें भिगोया करती थी कभी,
    अब आँखों बहती है और मन भीग जाता है।


    आज भी जब मिलता है अतीत मेरा,
    तो बस एक बात पूछता है -
    दो पल ही सही पंकज, क्या तू फिर से मुझे जीना चाहता है!


    पंकज ~


    (यह पोस्ट लगभग महीने भर पुरानी है जिसे इस ब्लॉग पर अब डाल रहा हूँ। पहले यहाँ पोस्ट की थी।)

    Thursday, January 24, 2008

    गम्मती फिर जागने लगा है! (एक लघुकथा)

    लगता है लोग गम्मती को भूल गए! अरे ठीक भी तो है, हम जब से गायब हुए एक बार भी किसी के हाल चाल पूछने या उनकी बातों पर अपनी उल्टी-सीधी राय देने नहीं पहुँचे बस गायब हुए तो हो ही गए। कोई अता-पता ही नहीं। और ये सही भी है, भला क्यों कोई याद करता हमें। हम कौनसे चिट्ठों और टिप्पणियों के झण्डे गाड़कर गायब हुए थे जो कोई न कोई सज्जन हमें ढूँढने की कोशिश भी करता। चलिए अब स्वयं से तो मैं लड़ता रहूँगा। अभी तो आपको ये बता दूँ कि मैं फिर से आ गया हूँ (पता नहीं कब तक रहूँगा)। सच में बड़ी हिम्मत करनी पड़ी फिर से हाथ चलाने और टिपियाने के लिए।

    आप लोग फिर से स्वागत करेंगे तो अच्छा लगेगा...
    पढ़ाई, काम, इधर-उधर की दौड़भाग और ज़माने भर के बहाने बनाकर ये कहता रहा कि समय नहीं मिल पा रहा है। पर अब बहुत हो गया आख़िर एक बार पोस्ट डालने का कीड़ा लगा है, तो भला छुटेगा क्या? जब वापस आया तो यही देखा कि कहीं ब्लॉग्स पर भारत रत्न की खींचतान है, तो कोई गुजरात चुनावों का अब तक विश्लेषण कर रहा है। कोई सेंसेक्स की उछलकूद पर चिंतित है, तो कोई बिहारी होने के नफ़े-नुकसान पर। इसलिए सोचा कि अपन तो ट्रैक ही बदल लो और सीधी-सादे अंदाज़ में वापस लौटो। इसलिए ही एक लघुकथा छाप रहा हूँ...


    * पागल का भोलापन...


    वो रात में अकेला ख़ुद के बारे में सोच रहा था। अपने विचारों के तारों में उलझा हुआ कभी इधर खिंचाता कभी उधर। कितनी ही बातें मन में आईं और गईं होंगी। पर फिर भी उसे लगा कि कुछ सूझ नहीं रहा था। वाकई वह स्तब्ध था अपने आप से, अपने जीवन की रफ़्‍तार या उसके ठहराव से। वो जीवन की रफ़्तार के साथ दौड़ने को आतुर था, किंतु फिर भी कुछ देर थमना चाहता था। अपने स्वार्थ और जीवन की सच्चाई के बीच की परतों को खरोंच-खरोंच कर हटाने की कोशिशें करने लगा। और हमेशा मौन रहकर उसे समझने की कोशिश करने वाला उसका साथी उसे देखकर हँस रहा था।

    वह निस्तब्ध उसे देखकर मुस्कुता रहा और फिर कुछ क्षणों बाद वह भी साथी की तरह गंभीर हो गया। वो अपनी रौशनी से अंधेरे में छिपी बातों को भाँप लेने का प्रयास कर रहा था। कुछदिनों से उसने अपने साथी को हँसता हुआ देखा था। बिलकुल बेफिक्र संसार की परवाह किए बिना, धुन में जीने वाला उसका साथी। वो साक्षी था जब वो सर्द रात में सड़कों पर हँसते हुए गाड़ी दौड़ाता था। जब बाहें फैलाकर ठंडी हवाओं को खुद में समा लेता था। सुनसान सड़कों पर गाने गाता आगे बढ़ता था। रास्ते में आने वाली हर चीज़, हर पत्थर को पीछे छोड़ने पर ठहाका लगाता था। रात्रि के अंधेरे में छत पर अकेला नाचता था। पर आज उसे ऐसा लगा कि उसका साथी ख़ुद पर हँस रहा था।

    दरअसल उसे अपनी क़ीमत का एहसास हो रहा था। ऐसा नहीं था कि उससे किसी ने प्रेम नहीं किया, वो किसी का लाड़ला नहीं था, उसके दोस्त उसकी बात नहीं सुनते थे, उससे किसी बारे में बातें नहीं करते थे, वो अभी तक दोस्तों के बीच किसी पवित्र और ईमानदार बंधन में नहीं बंधा था। लेकिन इन सब के बावजूद कुछ ऐसा हुआ था जो उसके लिए बहुत नया था। कोई उसके मन की सुनना चाहता था, उसे अपनी सुनाना चाहता था। कोई उस पर विश्वास करने लगा था। अपना अक्स उसमें तलाशने लगा था। और उसे ये अजीब लग रहा था कि वह कुछ न करते हुए भी उसके चिंतक की सभी उम्मीदों पर खरा उतर रहा था। वो नहीं जानता था कि उसे आगे क्या करना है। कितनी ख़ुशियाँ बाँटनी हैं। कितना ख़ुद ख़ुश रहना है। वो तो बस वही करता जा रहा था जो उसे करना था और जो वो करता था। पर उसके ऐसे ही कामों ने उसकी इज़्जत बढ़ा दी थी कहीं न कहीं जिस पर वो विश्वास नहीं कर पा रहा था।
    वो इन सबके साथ रहते हुए भी इन बातों से दूर भाग रहा था। ऐसे दुबके-दुबके कि किसी को एहसास भी न हो और वह फिर से उसी ढर्रे पर लौट आए। वही रास्ता जहाँ वह अकेले रहकर सबको ख़ुश करने का प्रयत्न करता रहता था। उसे लग रहा था कि वो जो कर रहा है किसी को दुख नहीं पहुँचाएगा। किंतु आख़िर किस-किसी को ख़ुश रख सकता था वो। उसे यह समझने में ज़रा देर लग गई थी कि किसी की ख़ुशी के पीछे किसी का दुख तो होगा ही। यही जानकार ही उसने निश्चय किया। वह अनजाने व्यक्ति को दुख न पहुँचाने के लिए प्रत्यक्ष खड़े उसके अपने अक्स के चेहरे की रंगत उसका हक़ नहीं छीन सकता था। यह अन्याय होता उसके अक्स पर और ख़ुद पर भी।

    ये सब सोचकर, स्थिति को जान परखकर साथी की गंभीरता उड़ी और वह और ज़्यादा हँसने लगा। वो उसकी तरफ़ व्यंग भरी दृष्टि से देख रहा था। अब उसे हँसी आ रही थी अपने साथी के पागलपन पर, उसके भोलेपन पर। हाँ, शायद वो भोलापन ही तो था जो वो एक विश्वास के बंधन की चरम सीमा से डर रहा था। परंतु अब ऐसा नहीं था, उसने अपने स्वार्थ और सत्य के बीच की परतों को हटा दिया था। उसके मन में उस विश्वास को अभय होकर पूरा करने और निभाने की क्रांति आ गई थी। दोनों साथियों की नज़रे अचानक मिलीं, और दोनों फूट पड़े ठहाके लगाने लगे। शुरू में चुप बैठने वाला ख़ुद पर हँस रहा था। और दूसरा वाला अपने साथी के पागलपन पर उसके भोलेपन पर...।

    Friday, September 14, 2007

    ~ हिन्दी “मौसी” नहीं “माँ” है ~


    "ओह! हाय मॉम आई एम बैक फ़्राम द स्कूल। हाऊ शुड आई टेल यू, इट वॉस ए लॉन्ग टायरिंग डे मॉम। एंड यू नो आई हेव वन टुडेज़ ‘हिन्दी डे' डिबेट कॉम्पिटिशन।"
    ये बर्गरयुगी भाषा है दुनिया के दूसरे सबसे अधिक आबादी वाले देश के युवा की। हमारी राष्ट्रभाषा होने का गौरव पाने वाली हिन्दी भाषा की असली तस्वीर यह है कि उस भाषा में मिले सम्मान का बखान भी दूसरी भाषा की बैसाखी के सहारे किया जा रहा है।
    हिन्दी दिवस मनाने का ख़ुमार फिर चढ़ रहा होगा। विद्यालय, कॉलेज, और संगठनों में फिर से हिन्दी के समर्थन में बैनर और पोस्टर तैयार होंगे। हिन्दी चुटकुला प्रतियोगिता और हिन्दी की ‍कविता, कहानी और वाद-विवाद के आयोजन भी भरपूर उत्साह से किए जाएँगे। राष्ठ्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भी हिन्दी का गौरवगान इसी के शब्दों से किया जाएगा और वक्ता भी हिन्दी प्रेम से फूल जाएँगे। लेकिन फिर से हिन्दी के नाम अपने सम्मान के लिए अगला हिन्दी दिवस आने तक की प्रतीक्षा भर रह जाएगी।
    इतिहास के अध्यायों में तो हिन्दी का जन्म 5000 ई.पू. बताया गया है। अंग्रेज़ी और हिन्दी दोनों भाषाओं को इंडो-यूरोपियन पैरेंट लैंग्वेज का हिस्सा माना जाता है। अंग्रेजों ने भी भारत में लगभग 200 सालों तक सियासत की और ज़ाहिर तौर पर अंग्रेज़ियत की छाप भी भारत पर पड़ी। किंतु ये हिन्दी भाषा की समृद्धता ही थी जो इन सबके बावजूद उसका मूल स्वरूप बरकरार रह सका।
    हिन्दी यूँ तो भारत की ही भाषा है किंतु फिर भी यहाँ उससे सौतेला व्यवहार करना ही सफलता का सूत्र बन गया है। अब यह भाषा ‘माँ’ की गद्दी से उठाकर ‘मौसी' की गद्दी पर विराजित कर दी गई है। अंग्रेज़ी के बाद दूसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा को विश्वभर में क़रीब 50 करोड़ लोग बोलते हैं। हिन्दी को समझने वालों की संख्या भी 80 करोड़ के लगभग है। इन आँकड़ों के होने पर भी यह हिन्दी की अनदेखी का ही परिणाम है कि इसे अब तक संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा होने का गौरव नहीं मिल सका है।
    26, जनवरी 1965 को हिन्दी भारत की आधिकारिक भाषा तो बन गई, लेकिन फिर भी यह ससम्मान आम जन की भाषा नहीं बन पाई। आलम यह है कि आज हमें हिन्दी ठीक से आए न आए, अंग्रेज़ी में ''हाय, हैलो! आई एम फ़ाइन'' कहते ज़रूर आना चाहिए। यह हिन्दी दिवस का उत्सव अंग्रेज़ी या किसी अन्य भाषा के अपमान के लिए बिलकुल नहीं है। इसे तो एक प्रयास माना जाए हिन्दी को उसके उचित शीर्ष स्थान पर सर्वसम्मति से काबिज़ करने का।
    नेहरु जी ने एक बार कहा था, ''मैं अंग्रेज़ी का इसलिए विरोधी हूँ क्योंकि अंग्रेज़ी जाननेवाला व्यक्ति स्वयं को दूसरों से बड़ा समझने लगता है, और उसका एक अलग ही वर्ग बन जाता है। यही होता है इलीट क्लास।'' इसकी प्रासंगिकता यही है कि आज ऊँचे ओहदों की आवश्यकताओं में अंग्रेज़ी एक प्रमुख योग्यता है। आज हर कोई अंग्रेज़ी सीखकर ही बड़ा बनना चाहता है और बन सकता है।
    हिन्दी बोलने वालों की संख्या का एक आकलन ये स्थिति पेश करता है ~





    भारत - 363,839,000
    बांग्लादेश - 346,000
    बेलिज़ - 8, 455
    बोट्सवाना - 2000
    जर्मनी - 24,500
    नेपाल - 170, 997
    न्यूज़ीलैंड - 11,200
    फ़िलीपींस - 2,415
    सिंगापुर - 5000
    दक्षिण अफ़्रीका - 890, 292
    युगांडा - 147, 000
    युनाइटेड किंगडम - 243 000
    यूएसए - 26,253
    यमन - 65, 000

    कुल - 487,000,000


    क्या इनके सामने होने पर भी किसी व्यक्ति का हिन्दी बोलने से परहेज़ करना जायज़ है। क्या ये आँकड़े हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
    कॉन्वेंट विद्यालयों में जाने वाला बच्चा आज ''बनाना'' खाने की ज़िद करता है, उसे केला पसंद नहीं है। उसे नहीं पता है कि पहले ''खाना बनाना'' होता है बाद में खाना। फ़ास्ट फूड़ से पेट की भूख शांत कर ली जाती है, और तेज़तर्रार अंग्रेज़ी से संवाद की ज़रुरत पूरी हो जाती है। हिन्दी सशक्तिकरण में भला हो बॉलीवुड फ़िल्मों का जिन्होंने हिन्दी को भारत में ही नहीं, उन देशों में भी व्यावसायिकता की कसौटी पर खरा उतारा जहाँ के बाज़ार में अन्य भाषाओ का वर्चस्व रहा है। बॉलीवुड में निर्मित बॉलीवुड की हिन्दी फ़िल्मों ने पश्चिम में भी कई रिकॉर्ड तोड़ते हुए अपनी पूरी क़ीमत वसूली है। यह हिन्दी भाषा-भाषियों की ही जीत मानी जाएगी कि स्पाइडरमैन, हैरी पॉटर और स्टार वॉर्स जैसी हॉलीवुड श्रृंखलाओं के अंग्रेज़ी और हिन्दी संस्करण एक साथ रिलीज़ किए गए हैं।



    हिन्दी से संबंधित ऐसे तथ्यों, कथनों, और हिन्दी दिवस के प्रसंग से अधिक महत्व इस बात का है कि हिन्दी और भारतीय भाषाओं के बिना भारतीय संस्कृति का अस्तित्व संपूर्ण नहीं माना जा सकता। यहाँ किसी भाषा युद्ध का बिगुल फूँकने की तैयारी की‍ कतई आवश्यकता नहीं है। किंतु जब हर तरफ़ अलग-अलग तरीके से कई मुद्दों पर कितने ही प्रकार के युद्ध हो रहे हैं ते एक युद्ध ये भी सही। युद्ध अपने आप से, अपनी भाषा की विजयश्री, सम्मान और गौरव सुनिश्चित करने के लिए। हिन्दी को फिर से माँ बनाने का युद्ध।

    "जय हिन्द, जय हिन्दी"