Wednesday, April 25, 2007

हाई प्रोफ़ाइल शादियों की निजता भी सार्वजनिक होती है

मंगल-मंगल, मंगल-मंगल, मंगल-मंगल हो। जागे नगर सारे, जागे हैं घर सारे, जागा है अब हर गाँव। पिछले हफ़्‍ते तो यही आलम था पूरे देश में अभिषेक-ऐश्वर्या की शादी को लेकर। हर किसी ने भरपूर कोशिश की इस शादी को भुनाने की किंतु विनम्र अमिताभ के शांत और चिर-परिचित शिष्टाचारी स्वभाव ने सबको अपनी हदों में रहने पर मजबूर कर दिया। और यह शादी तीन-तीन धार्मिक, और सांस्कृतिक रस्मों से संपूर्ण हो गई। फिर भी जब बॉलीवुड के दिग्गज के घर शादी हो तो, कोई हंगामा तो ज़रुर होगा ही। यही कमी पूरी की हया रिज़वी, उर्फ़ जाह्नवी कपूर ने (इनका तीसरा नाम याद नहीं आ रहा)।
हया ने जब शादी के एक दिन पहले अपने हाथों की नस काट ली तब उसे बिल्कुल हया नहीं आई। और जब टीवी पर उसे उसकी नशीली हालत में दिखाया गया तो उसने मीडिया पर भी उसे ग़लत तरीके से पेश करने का इल्ज़ाम जड़ दिया। फिर भी शादी निरान से हो गई। शादी तो निपट गई फिर क्या था जाह्नवी दो दिन शांत रही और फिर से उसका अभिषेक प्रेम जाग उठा और उसकी मदद करने के लिए राजनीतिक पार्टियों के लोग भी आगे आए। ज़ाहिर है कि अमिताभ के घर के दो सदस्य राजनीति से जुड़े हैं (जया और अमर सिंह जी) तो राजनीतिज्ञों को भी इस शादी में विशेष रुचि थी। बस मुंबई में एनसीपी के कार्यकर्ता ले गए जाह्नवी को उपमुख्यमंत्री पाटिल साहब से मिलवाने के लिए, जहाँ जाह्नवी तो अभिषेक से प्रेम और शादी का राग अलाप रही थी जो कि एनसीपी के एक कार्यकर्ता को बिल्कुल नहीं भा रहा था, और उन्होंने पीछे से जाह्नवी के कान में अमर सिंह का नाम डाल दिया, ये क्या!!! हया का सुर पूरी तरह बदल गया और अमर सिंह पर एक साथ कई आरोप लग गए। आश्चर्य तो इस बात का है कि जाह्नवी जिस अभिषेक बच्चन से प्रेम करती हैं और एसएमएस से बात होने का दावा करती हैं, उनके पास छोटे बच्चन का कोई नंबर तक नहीं है। ख़ैर संभव है कि वायरलेस पर बात होती होगी हमें क्या?? जाह्नवी का कश्मीर, और लखनऊ से भी वास्ता है किंतु वे इसे नकार रही हैं (नए घर में जाने के लिए पुराने घरों को भूलना चाहती हैं)। अपने पति और बच्चे को भी वे नहीं पहचानती। 1997 में 4:30 बजे पुष्पक एक्सप्रेस से मुंबई आने वाली जाह्नवी उर्फ़ हया को मुंबई में वाकई किसी से हया नहीं आई इसलिए वे इतने सार्वजनिक रूप से नए जोड़े के शुरुआती दिनों को बिगाड़ना चाह रही हैं।
इस शादी का दूसरा मसला इसमें आने वाले आमंत्रित लोग रहे। मीडिया ने निमंत्रित लोगों की सूची जुगाड़ने के प्रयास विफल रहे। भई घरवाले ही पसोपेश में हों तो बात बाहर कैसे जाएगी भला। ऐश्वर्या, रानी को नहीं बुलाना चाहतीं थी, अभिषेक को सलमान और विवेक (या ऋतिक भी) के आने से ऐतराज़ हो सकता था। जया को रेखा का आना पसंद नहीं होता, तो अमर सिंह को शाहरुख की उपस्थिति गवारा न होती। अब इस सबके बीच फँसे थे अमिताभ जो सलमान के बाबूजी और रानी के बाबूल रहे फिर भी घर की शादी में उन्हें न बुला सके। वाकई ये शादी बहुत निजी थी, और किसी को इसके बारे में कुछ नहीं पता है। क्या आपको पता है??? बस यही कहिए मंगल-मंगल, मंगल-मंगल, मंगल-मंगल हो....

Thursday, April 12, 2007

हिंदु-मुस्लिम शादी का गाना - हम आपके हैं कौन!!!

चिट्टा जगत में बहुत दिनों से हिंदु-मुस्लिम और उन पर होने वाली राजनीति पर कलम घिसी जा रही है। कमोबेश यही हाल हर न्यूज़ चैनल का भी है। और हो भी क्यों न कब तक क्रिकेट और सचिन के विवादों से टीआरपी बढ़ाएँगे, वैसे भी इन मुद्दों के मंद पड़ते ही नए मुद्दे तो चाहिए ही न! और फिर बात हिंदु-मुस्लिम की शादी की हो तो क्या कहने!! उमर और प्रियंका वाधवानी की शादी भी होनी तो आम ही थी पर म.प्र. से मुंबई तक लगी उनकी दौड़ सबकी नज़रों में आ गई। और इसका परिणाम सिंधी समाज की हर लड़की पर पाबंदी के रूप में सामने आ गया।
पिछले चार-पाँच दिनों से मीडिया में उमर-प्रियंका की शादी मामला हर किसी के कानों में गूँज रहा है। 2 अप्रैल को उमर और प्रियंका वाधवानी के घर से गायब होने के बाद उमर पर प्रियंका के अपहरण का मामला दर्ज ‍करा दिया गया। लेकिन कल मुंबई में इन दोनों की शादी होने की ख़बर और मुंबई हाई कोर्ट द्वारा उसे वैध करार दिए जाने पर भोपाल में भारी बवाल मच गया। हिंदु समाज के सभी प्रतिनिधि प्रियंका को शादी की बधाइयाँ कम दे रहे थे और समाज के मुँह पर कालिख पोतने का इल्ज़ाम लगाए जा रहे थे। कल इस मुद्दे पर एक न्यूज़ चैनल पर लाइव कार्यक्रम देखा जहाँ प्रियंका उसकी और उमर की शादी का पुरज़ोर विरोध करने वालों से केवल एक सवाल पूछना चाह रही थी, वो ये कि यदि उसने और उमर ने एक साथ सुख-दुख बाँटने का फ़ैसला कर लिया है तो कोई विशेष दल या संगठन उनका विरोध करने वाला कौन होता है। दो घंटे तक लंबी बहस चली महिला विशेषज्ञों ने अपने तर्क रखे, दल विशेष के लोगों ने अपना आक्रोश प्रकट किया, और चैनल को अच्छे दर्शक मिल गए, लेकिन प्रियंका का सवाल जहाँ से शुरु था वही पर आ कर ख़त्म हो गया!!! उमर बेचारा चुप-चाप बैठा सुनता रहा और कभी-कभार उसके मुँह से भी भय से उपजे एक दो शब्द सुनने को मिल ही गए।
म.प्र. में इस प्रेमी युगल को शादी करने की अनुमति नहीं दी गई और इन्हें भागकर मुंबई कोर्ट के सामने अपने प्रेम करने का दोष सुनाना पड़ा, मुंबई कोर्ट ने भी सज़ा के तौर पर इनकी शादी को मान्य क़रार दे दिया और म.प्र. शासन से इनकी सुरक्षा की अपील भी की जिससे ये दोनों तो ख़ुश हो गए लेकिन समाज के लोगों के मुँह लाल हो गए। इसमें भी कमी‍ थी तो सुबह-सुबह ही सिंधी समाज ने सिंधी लड़कियों के मुँह पर कपड़ा बाँध कर घूमने और मोबाइल रखने पर रोक लगा दी। उमर-प्रयंका अपने घर लौटना तो चाहते हैं उनके साथ पूरे देश और न्यायालय का समर्थन भी है, लेकिन उनके घर और समाज के सम्मान की चिंता करने वाले लोगों के बयान और तेवरों को देखकर उमर-प्रयंका के चेहरे पर उभरे भावों से तो ये नहीं लगता कि वे जल्द से जल्द अपने घर जाने को तैयार हो जाएँगे। अब उनके लिए ये तय करना वाकई मुश्किल है कि कौन उनका है कौन पराया। कार्यक्रम के बाद मेरे मन में भी ये गम्मत हुई कि प्यार करने के लिए समाज और परंपरा को ध्यान में रखना चाहिए, यदि सामने वाला आपके धर्म का नहीं हो तो यही कहना ठीक होगा कि - ''हम आपके हैं कौन''

Saturday, April 7, 2007

क्रिकेटीय नीतियाँ, और नए-नए शगूफ़े

शुरुआत में कुछ भड़ास निकालना चाहता था पर फिर इच्छा हुई कि भारतीय टीम और गुरु ग्रैग की रणनीति की प्रशंसा करूँ इसलिए पोस्ट में दोनों चीज़े शामिल कर लीं, पर क्रिकेट भक्ति तो आपको अंत में ही दिखेगी। तो ''श्री क्रिकेटाय नमः''...
2003 के वर्ल्डकप में आख़िरी कुछ ओवर्स में भारत की हार के बाद ही चैपल साहब ने संभवत: भारतीय टीम से जुड़ने का मन बना लिया था। वे ठहरे प्रयोगवादी और यदि नीतियों, नियमों, और मनुष्यों के बीच प्रयोग करना हो ऐसे प्रयोग भारत से अच्छे और भला कहाँ हो सकते हैं। आँकड़ों को देखें तो चैपल जी ने भारत की हार-जीत का अनुपात बराबर रखा है और उसे विदेशों में भी जीत का स्वाद चखाने का श्रेय ले गए हैं। आते ही उन्होंने नए खिलाड़ियों की ख़ूब भर्ती करवाई और राइट साहब के बनाए गए नए-नए उभरते खिलाड़ी (नाम आप सबको पता ही हैं) इनके प्रयोगों की बलि चढ़ते गए। एक कोच के तौर पर तो वाकई चैपल जी प्रशंसनीय है, किंतु उनके पट्टी-पहाड़े भारतीय बच्चों की समझ से परे हैं। वे कहें कि ''टू वन ज़ा टू, टू टूज़ा फ़ोर'' तो हमारे खिलाड़ी --- अरे क्षमा करें खिलाड़ी नहीं हमारे खेल बोर्ड में बैठे राजनीतिज्ञ कहते हैं ''दो एकम दो, दो दूनी पाँच''। अब भला मास्टर जी भी क्या करें उन्होंने सीखाया, खिलाड़ियों ने सीखा और समय-समय पर साबित भी किया पर बोर्ड में खेल कम और राजनीति व गुटबाज़ी के बयानों और मीडिया की महिमामंडित ख़बरों ने मतभेदों को मनभेदों में बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

वैसे मुझे 22 माह के कार्यकाल में एक पेंच और नज़र आता है कि कहीं चैपल जैसे गुणी खिलाड़ी के भारतीय क्रिकेट में आने से किस-किस को फ़ायदा हुआ है (बेशक बांग्लादेश को तो हुआ ही है)। शुरुआत मैनें 2003 वर्ल्डकप से की थी, तो फिर वहीं ले चलता हूँ। उस समय भारत की शुरुआत अच्छी नहीं रही पर फिर जिस तेज़ी और जूनून से भारतीय टीम फ़ाइनल तक पहुँची उससे ऑस्ट्रेलिया घबरा तो गया था पर फिर भी उन्होंने इस घबराहट का इलाज अपनी फ़ाइनल जीत के साथ ही ख़त्म किया। यदि भारत वह वर्ल्डकप बुरी तरह नहीं हारता तो आस्ट्रेलिया का सिक्का उतना नहीं चमकता जितना कि पिछले चार सालों में चमका है। क्योंकि भारत की उस टीम में लड़ने की कूवत थी, जो अब नहीं है अब बस किसी भी तरह जीतने की ललक है पर उसके लिए ज़रूरी लड़ाई मैदान पर लुप्त रहती है। चैपल जी के कार्यकाल ने दूसरा फ़ायदा वेस्टइंडीज़ को कराया जिन पर चैपल जी ने सोए हुए शेर का फिकरा कसा था। और ये तारीफ़ सुनकर जब वह जागा तो उसकी चिंघाड़ से सारे भारतीय दिग्गज गांधीजी के तीन बंदरों के मानिंद हो गए, आँख-कान-मुँह सब बंद। पाकिस्तान क्रिकेट को भी इस बात की ख़ुशी हुई कि कोच-खिलाड़ी-बोर्ड के विवाद केवल उसी देश में नहीं होते हैं बल्कि पड़ोसी भी हमारे साथ हैं। अब बचा श्रीलंका, तो उसे फ़ायदा हुआ चैपल की नीति का जिसमें उन्होंने सीनियर-जुनियर का राग अलापा था। लेकिन उसका असली फ़ायदा तो श्रीलंका को ही मिल पाया।

क्रिकेट के महाकुंभ में सभी देश अमृतपान की अभिलाषा लिए आए थे, किंतु ये वर्ल्डकप वूल्मर साहब की मौत, और पहले ही दौर में भारत-पाकिस्तान की कड़ी पराजय का विष दे गया। इस पर भी कमी थी तो भारत के स्वदेश लौटने पर हार के पोस्टमॉर्टम की चर्चाएँ गरम हैं। बैठकें होंगी नया स्थायी कोच चुना जाएगा, कप्तान का भविष्य है तो पर कितना उज्वल यह पता नहीं। भारतीय चुनौती तो ख़त्म हो गई है पर अब भारतीय क्रिकेट प्रेमी नारे तो लगा ही सकते है पर वो नारे ऐसे होना चाहिए -- ''जीतेगा भाई जीतेगा, बांग्लादेश जीतेगा। जीतेगा भाई जीतेगा, श्रीलंका जीतेगा''। और अब क्रिकेट के दिग्गज हार की समीक्षा में एक नई सफ़ाई ये दे सकते हैं कि ''हमारी नज़रे सितंबर में होने वाले 20-20 वर्ल्डकप पर है, हम अपना सारा ध्यान उसमें जीतने पर लगा रहे हैं''। इसलिए सभी क्रिकेट प्रेमियों से अपील है कि अपनी ऊर्जा उस वर्ल्डकप ले लिए बचाकर रखें।मैं भी क्रिकेट प्रशंसक हूँ इसलिए एक बार और ''जीतेगा भाई जीतेगा, बांग्लादेश जीतेगा, जीतेगा भाई जीतेगा, श्रीलंका जीतेगा।''

Tuesday, April 3, 2007

''आरक्षण के खेल पर...सम‍ीक्षा के बादल''

नमस्कार सभी भारतीयों को, आप सभी का स्वागत है कलयुग की राजनीति में छिड़ चुके न्यायालय और विधायिका के बीच होने वाले वैचारिक द्वंद्व में, जिसमें दाँव पर लगा है अन्य पिछड़े वर्ग का उच्च शिक्षा में 27 प्रतिशत आरक्षण। दोनों ही पक्ष जी-जान से आरक्षण से मिलने वाले ईनाम के पीछे लगे हैं। राजनीति यह मुकाबला जीतकर वोटों की तालियाँ बटोरना चाहती है, वहीं न्यायालय संविधान का रक्षक होने का दायित्व पूर्णत: निभाना चाहता है। और इस द्वंद्व के रैफ़री हैं वे हज़ारों छात्र जो इस वार्षिक सत्र से आईआईएम और आईआईटी में अपनी उच्च शिक्षा का सपना पूरा करना चाह रहे हैं। खींचतान शुरु हो चुकी है और मुक़ाबला रोचक होने के पूरे आसार हैं। देखना है कौनसा पहलवान अपने तर्कों की बदौलत किसे पटखनी देता है, और रैफ़री के रूप में लाचार बने छात्र (जो केवल विरोध या समर्थन का शांतिपूर्ण प्रदर्शन भर कर सकते हैं) कब तक इस द्वंद्व के मैदान के धूल-धुएँ में इन दोनों पक्षों को दिखाई नहीं देते।
राजनीति के खिलाड़ियों की अच्छी शुरुआत हुई और उन्होंने तुरत-फ़ुरत संविधान में संशोधन करके आरक्षण विधेयक लागू करके इस फ़िक्ड मैच का टॉस जीत भी लिया था, किंतु मैच शुरु होने के पहले ही न्यायालय के आकाश से समीक्षाओं की बरसात हो गई और सब किए धरे पर पानी फिर गया। अब राजनीतिक गलियारों में हर दल बस इन समीक्षाओं के बादल छँटने की राह तक रहा है ताकि आरक्षण का रोमांचक खेल फिर से प्रारंभ हो सके। पंजाब आम चुनावों में ज़ोर का झटका धीरे से खा चुकी काँग्रेस के लिए अब उ.प्र चुनावों के ऐन पहले अपनी केंद्रीय सरकार की साख बचाने की नौबत आ गई है। न्यायालय को संविधान और क़ानूनों की समीक्षा का अधिकार है और यही अधिकार अब सरकार को कटखरे में खड़ा कर चुका है।
सात आठ दशक पहले के दो रु. किलो के अनाज और आज के 20 रु. किलो के अनाज को देखकर यह कहना तो सही है कि मँहगाई बढ़ गई है, ‍लेकिन इसी नीति पर चलते हुए यह कहना कि 1931 के आँकड़ों से अनुमान लगाकर आरक्षण भी लागू किया जा सकता है, इस पर न्यायालय की समीक्षा का प्रश्न चिह्न लग गया है? अब सरकार यदि बाध्य होकर पुन: ताज़ा आँकड़े इकट्ठा करे, तो हो सकता है कि एक अविश्वसनीय रिपोर्ट सामने आ जाए और कोई उच्च जाति ही आरक्षित वर्ग की पात्रता पर खरी उतर जाए। डेढ़ दशक पहले जब सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण लागू हुआ था, उसके बाद से हर क्षेत्र में आरक्षण का महत्व बढ़ता ही गया है। पिछले 1-2 साल से तो अधिकांश लोग और समुदाय स्वयं को पिछड़ा साबित करने पर तुल गए हैं, और 8 प्रतिशत की विकास दर का दिव्य स्वप्न भी सरकार की प्राथमिकताओं में आरक्षण माँग रहा है। सरकार का तर्क है कि अन्य पिछड़ा वर्ग आर्थिक दृष्टि से भी बहुत पीछे है और उनके उत्थान हेतु उन्हें उच्च शिक्षा में आरक्षण दिया जाना चाहिए किंतु वर्तमान तथ्य ये हैं कि इस वर्ग के सबसे अधिक लोग दक्षिण राज्यों में किंतु भारत का ग़रीब तबका उत्तर-पूर्वी राज्यों में भरा है। और इस बात की गारंटी कौन लेगा कि केवल पिछड़ा वर्ग ही अपने बच्चों को उच्च शिक्षा में असमर्थ है, आज भी कई ऐसे कुलीन लोग हैं जो कंधों पर झोला और पैरों में चप्पल पहने दो जून की रोटी के लिए पसीना बहाते हैं, क्या उनको आरक्षण नहीं मिलना चाहिए।
भाई आरक्षण शब्द इतना ही प्यारा है तो उसे लागू करें लेकिन उसका आधार जाति को तो न बनाएँ। संविधान निर्माण के समय एक पवित्र मंशा के चलते आरक्षण की बात रखी गई थी, जो कालांतर में नेतागिरी की कुर्सी का एक अभिन्न पाया बन गई है। वैसे आरक्षण के लिए सरकार की फूर्ति भी शाबासी देने लायक है, यदि इतनी ही तत्परता भारत के सुरक्षा कार्यों में, भूखों को खाना खिलाने में, बच्चों को प्राथमिक शिक्षा देने में (उच्च शिक्षा तो हिमालय की चोटी है), किसानों की आत्महत्याएँ, और भ्रूण हत्याएँ रोकने में दिखाई जाती तो निश्चित ही हर वर्ग को नहीं किंतु मानव जाति को तो कुछ लाभ ही मिलता।
सभी राजनीतिक दल आरक्षण नाम का एक ऐसा सुर पिछड़े वर्गों को दे रहे हैं जो बजता तो उस वर्ग के लोगों के घरों में है, लेकिन इससे सुकूँ तो नेताओं के कानों को ही मिलता है और हमारी क्षमावान जनता को लगता है कि उनके जीवन के सुर सध गए हैं।

चिट्ठा जगत को पंकज का प्रणाम

भारत के ह्रदय मध्य प्रदेश और उसके ह्रदय मालवा के इन्दौर का रहने वाला हूँ। इससे अधिक बताने से पहले यह स्पष्ट कर दूँ कि मेरे पूरे परिवार की पिछली जितनी पीढ़ियों को मैं जानता हूँ, उनमें से किसी भी पूज्य ने कभी भी लिखने का दुस्साहस नहीं किया है। लेकिन इसी खानदानी रिवाज़ को तोड़ते हुए मैं मूरख चिट्टाकारिता का अपना सफ़र आरंभ कर रहा हूँ। बचपन से ही माता-पिता ने बड़े अरमानों से दाखिला अंग्रेज़ी माध्यम में करवा दिया और दसवीं के बाद गणित के गुणा-भाग करते हुए विद्यालय से नाता छूट गया। पढ़ाई के साथ-साथ नाचना-गाना, खेल-कूद और अन्य गतिविधियाँ चलती रही जिनके परिणाम स्वरूप ही लिखने-पढ़ने का दुर्गण भी मेरे साथ हो लिया।
साहित्य या पुस्तकों का इतना कीड़ा तो नहीं पर मिल जाए तो छोड़ता भी नहीं हूँ। सहकर्मियों द्वारा और काम के दौरान ही ब्लॉगिंग के बारे में जाना है। शुरुआत परिचर्चा में पंजीकरण द्वारा कर चुका हूँ पर स्वयं का चिट्ठा बनाने की हिम्मत जुटाने में महीना भर लग गया। इसी उधेड़-बुन में रहा कि चिट्टाकारिता में तो बड़े-बड़े गुणीजन अपने सिक्के जमा चुके हैं भला मैं इनके साथ कहाँ टिक पाऊँगा, किंतु फिर सोचा कि जब कोई बड़ी दावत होती है तो तरह-तरह के स्वाद की मिठाइयाँ बनती हैं, नमकीन बनाए जाते हैं और इस प्रकार के स्वादिष्ट भोजन के साथ कुछ कंकड़-पत्थर भी आ ही जाते हैं। तो बस मैं भी शामिल हो रहा हूँ रसीले, मीठे और नमकीन चिट्टाकारों के बीच एक कंकड़ की तरह जिस पर धारे-धीरे कोई स्वाद तो चढ़ ही जाएगा।....

अभी और बहुत कुछ लिखना बाकी है.... पर फिर सही!!!