Tuesday, August 2, 2011

शब्दों की आवाज़...


चलते-चलते शब्दों का कारवाँ कहाँ से कहाँ ले जाकर छोड़ देता है। एक ख़्याल से शुरू हुई रचना पता नहीं विचारों की दुनिया के किस छोर पर आकर ख़त्म हो कोई नहीं जानता। दिल्ली से बाहर निकलने की बैचेनी इस कदर हुई है कि मेट्रो में एक मित्र से बात करते-करते दिल्ली लगातार बहुत समय तक रहने की बात "घुटन" शब्द तक पहुँच गई। बीते हफ़्ते दीदी ने मुझसे मेरे पास मेरी बाइन ना होने पर आश्यर्च जाताया और सीधे पुछ डाला कि बिना बाइक के ज़िंदा कैसे है तू! जवाब में बस मुस्कुरा दिया। कल दिल्ली से एक हफ़्‍ते के लिए बाहर जा रहे हैं कुछ काम के लिए, पर जाने से पहले कुछ न कुछ लिखना चाहता था। कल रात बैठकर विचारों के घोड़े दौड़ाए तो इधर-उधर दौड़ने के बाद इन शब्दों की नकेल में बंध गए। हर शेर का अपने कई संदर्भ हैं ‍नीचे की कविता में। आप अपने हिसाब से अपनी ज़िंदगी से जुड़े अर्थ निकालने को स्वतंत्र हैं। बताइएगा ज़रूर कैसी लगी!

आवाज़... 

बेरहम घुटन को मेरी अब साँस दो,
दबे लफ़्ज़ों को मेरे तुम आवाज़ दो,
इश्क़ के नाम से न बांधों पंछी को,
जिसे उड़ना पसंद है उसे परवाज़ दो,

तुम्हारी शिकायतों पर हो मेरी ख़ामोशी,
मुझे तुम सज़ा देकर ख़ुद को इंसाफ़ दो,

नया शहर नए रिश्ते एहसास तो पुराने हैं,
भीड़ में अकेला क्यूँ हूँ कोई तो जवाब दो,

हसरतों की ज़मीन मेरी हुई अब बंजर,
रहने को मुझे हौंसलों भरा आकाश दो,

ख़ौफ़ज़दा कर रहा ये आने वाला कल,
मुस्कुराती यादों का वो मेरा इतिहास दो,

(मन की बैचेनी, टीस और शिकायतों के साथ मुल्क की नज़र कुछ शेर )

धमाके ये क्या ख़ाक बाँटेंगे मेरे घर को,
दो रहीम को शबद, राम को नमाज़ दो,

सबको बुलाकर यूँ लगाओ न बस मेले,
मंद पड़ी इस क्रांति को अब आग़ाज़ दो,

दहशत नहीं मुस्कान हक़ है बचपन का,
गुलों के हाथ गोली नहीं एक किताब दो,

~ पंकज