Saturday, June 19, 2010
Tuesday, April 13, 2010
गुड़िया...
एक गुड़िया रेशमी बालों वाली,
ऊपर नीचे करने पर,
आँखें मटकाने वाली,
वो जिसका चेहरा हमेशा खिला रहता,
जिसके साथ दिल बहला रहता,
अब कुछ खोई-खोई रहती है,
वो गुड़िया कहीं दिखाई नहीं देती है!
ऊपरवाले ने भी
मुस्कान को सिलकर भेजा था,
हर किसी से यूँ हँसकर मिल जाती,
हँसी के आगे नफ़रत पिघल जाती,
वो निश्छल बच्चों के रूठे मन को
चुटकियों में प्रफ्फुलित करके
उनके संग गुड्डा-गुड्डी के खेल में,
कल्पनाओं की सैर पर निकल जाती!
अब कुछ उलझी-उलझी रहती है,
वो गुड़िया कहीं दिखाई नहीं देती है!!
बचपन वाली उस गुड़िया के,
कड़क होने पर भी
हाथ कहीं, पैर कहीं रहते,
उसकी हरकतें आकर्षित करने वाली,
बेपरवाही और बेफ़िक्री से रहने वाली,
बदलती ऋतुओं के असर से परे वो,
हरदम एक सी रहकर भी
अपने उद्देश्य को पहचान बनाकर
एक गुड़िया का अस्तित्व निभाने वाली,
अब ज़रा व्यथित-कुंठित सी रहती है,
वो गुड़िया कहीं दिखाई नहीं देती है!!!
क्योंकि गुड़िया के साथ सब बदल गया है...
उसके नरम रबर के पीछे माँस चढ़ गया है,
वक्त के साथ अनुभव का काँटा गढ़ गया है,
कई गुड्डे-गुड्डियों के साथ मिलकर,
भैया-दीदी, दोस्त-सहेली, प्रेमी को पाकर
एक परिवार बनाया था उसने, जो बिछड़ गया है,
ज़िंदगी के चुंगल में फँसी गुड़िया,
अब सब रिश्तों से डरती है,
घुट-घुट कर अब वो मरती है,
अब जान गए हैं लोग भी देखो
के आख़िर क्यों???
वो खेलती-मुस्काती, सबको अपना बनाती
अब कुछ उलझी-खोई,
व्यथित-कुंठित सी रहती है
वो गुड़िया कहीं दिखाई नहीं देती है!!!
वो गुड़िया कहीं दिखाई नहीं देती है!!!
~ पंकज
चित्र ~ हमेशा की तरह गूगल महाराज की ओर से...सधन्यवाद!
गम्मती
पंकज
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11:37 PM
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Tuesday, February 16, 2010
वैलेंटाइन पर मधुमक्खियों की पप्पियाँ - BEE My Valentine!
गम्मती
पंकज
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5:28 PM
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Sunday, February 7, 2010
भारतीय सेंसरशिप का दायरा बढ़ाती इश्क़िया
गम्मती
पंकज
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1:10 AM
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Tuesday, January 26, 2010
जीवन, अभिनय, और बड़ा होना एक SONGहँस है।
- यदि आपको कहा जाए कि अक्षय कुमार की फ़िल्म संघर्ष को मूक अभिनय करके दर्शाइए तो आप क्या करेंगे??? कल हमने क्या किया ये सुनिए! ये नाम हमने अपने विरोधियों को दिया था। तो उनमें से अभिनय करने वाली दोस्त ने सबसे पहले तो गाना गाने के हाव भाव बनाए और फिर अचानक हँसने लगी। बाद में “गाना” बन गया “Song” और फिर हँसने से “हँस” को अलग किया गया। अब इन दोनों को मिलाकर बना “Songहँस”। अब आया असली ट्विस्ट जिस प्रकार “मरा-मरा” के लगातार उच्चारण से “राम” निकलता है, वैसे ही Songहँस को निरंतर अलग-अलग तरह से हिंदी, अंग्रेज़ी, पंजाबी, बांग्ला में बोलते रहने पर निकला “संघर्ष” और उन्हें उत्तर मिल गया।
- अब हमें फ़िल्म “ब्लफ़मास्टर” का नाम बताना था कैसे किया जाए??? तो सबसे पहले “बल्ब” सुझाया फिर उसे इंदौरी स्टाईल में “बलफ़” किया। “मैं” से “मा” निकाला। “सिर” से “स”, “टांग” से “ट” और “रम” से “र” निकाला। और इन सबको जोड़कर बन गया “बलफ़मासटर” फिर इसे अंग्रेज़ी लहजे में बुलवाने पर आया “ब्लफ़मास्टर”।
- अब वास्तव, वजूद, बेताब, मि. एंड मिसेज़ अय्यर, मिशन इंस्तांबुल, घातक, काबुल एक्सप्रेस, ग़ुलाम-ए-मुस्तफ़ा जैसे नामों के लिए क्या-क्या किया गया होगा ये आप ख़ुद कल्पना कीजिए!!!!
गम्मती
पंकज
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12:33 AM
9
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Monday, January 25, 2010
अतीत के पन्नों से... एक बार फिर
जहाँ लिखने की बात आती है, तो हर बार ख़ुद से एक वादा होता है कि इस बार शुरु करने पर रूकना नहीं है। कभी समय का बहाना, तो कभी विचारों की कमी का, तो कभी ख़ुद से लड़ने की मंशा की चलते लिखने का मन नहीं होता। लेकिन इस बार कुछ ज़्यादा हो गया। इस बीते समय के कितने की लम्हे आए जब मैं मन के द्वंद्व को शब्दों में लपेटकर एक अच्छी या बुरी याद के रूप में सज़ा सकता था। कई महीनों बाद फिर से जूनून सवार हुआ तो एक ही बार में 32 किलोमीटर साइकिल चला ली, अभिनय के संसार को तलाशा या कहूँ ख़ुद को, अपनी प्यारी सी भतीजी के बहाने बीते बचपन मे गलियारे में होकर आया, दूरदर्शन पर खेती बाड़ी की बातें भी कर लीं और हिप-हॉप हैंपनिंग काम भी किए, कितनी बातें थीं करने के लिए, पर ग़लती तो हो गई। दुनिया जहान की गम्मत में हिस्सा लेते-लेते ख़ुद की गम्मत के इस कोने से ज़रा, नहीं ज़रा नहीं बहुत दूरी हो गई थी। दोस्तों से बातों-बातों में कई बार कहा कि फिर से कीबोर्ड घिसने की इच्छा हो रही है, उन्होंने स्वागत भी किया हौंसला दिया। फिर ये सब बातें रात के जूनून में तो सर पा छाई रहीं और सुबह इतनी रौशनी होने के बाद भी कहीं गायब हो गईं जिन्हें खोजने की कोशिश भी नहीं की।
ख़ैर इस बार कोई वादा तो नहीं है करने के लिए लेकिन बने रहने की कोशिश भर तो रहेगी ही। फिलहाल गम्मत पर ये रचना, आप सबके लिए और आपकी टिप्पणियाँ मेरे लिए...
गम्मत पर मिलते रहेंगे...
अतीत का आईना...
देखकर आईने में एक शख़्स नज़र आता है,
मैं तो खड़ा रहता हूँ और वो मुस्कुराता है,
हमने तो दिल का हाल कभी कहा नहीं उसे,
आँखों से कैसे भला कोई मन पढ़ पाता है।
यूँ तो बंद आँखों में हमेशा एक ख़्वाब पलता है,
बस आँखें खुलती हैं और वो अधूरा रह जाता है।
अरसा हुआ उनसे मिलने की तमन्ना सी है,
वो नहीं बस उनका ख़्याल आकर सताता है।
कहाँ तो तक़रार उस रिश्ते की पहचान थी,
आज देखो वही शख़्स मेरा ख़ास कहलाता है।
कमबख़्त दोस्त ख़ुशी का ठिकाना कहते हैं मुझे,
फिर क्यों कहीं आँसू झलकने पे मेरा नाम आता है।
फ़िक्र, द्वेष, घृणा, छल तो आज हर चेहरे पर है,
वो नन्हा चेहरा आख़िर मासूमियत कहाँ से लाता है,
बचपन में बारिश हमें भिगोया करती थी कभी,
अब आँखों बहती है और मन भीग जाता है।
आज भी जब मिलता है अतीत मेरा,
तो बस एक बात पूछता है -
दो पल ही सही पंकज, क्या तू फिर से मुझे जीना चाहता है!
पंकज ~
(यह पोस्ट लगभग महीने भर पुरानी है जिसे इस ब्लॉग पर अब डाल रहा हूँ। पहले यहाँ पोस्ट की थी।)
गम्मती
पंकज
इस घड़ी
11:30 PM
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Thursday, January 24, 2008
गम्मती फिर जागने लगा है! (एक लघुकथा)
लगता है लोग गम्मती को भूल गए! अरे ठीक भी तो है, हम जब से गायब हुए एक बार भी किसी के हाल चाल पूछने या उनकी बातों पर अपनी उल्टी-सीधी राय देने नहीं पहुँचे बस गायब हुए तो हो ही गए। कोई अता-पता ही नहीं। और ये सही भी है, भला क्यों कोई याद करता हमें। हम कौनसे चिट्ठों और टिप्पणियों के झण्डे गाड़कर गायब हुए थे जो कोई न कोई सज्जन हमें ढूँढने की कोशिश भी करता। चलिए अब स्वयं से तो मैं लड़ता रहूँगा। अभी तो आपको ये बता दूँ कि मैं फिर से आ गया हूँ (पता नहीं कब तक रहूँगा)। सच में बड़ी हिम्मत करनी पड़ी फिर से हाथ चलाने और टिपियाने के लिए।
आप लोग फिर से स्वागत करेंगे तो अच्छा लगेगा...
पढ़ाई, काम, इधर-उधर की दौड़भाग और ज़माने भर के बहाने बनाकर ये कहता रहा कि समय नहीं मिल पा रहा है। पर अब बहुत हो गया आख़िर एक बार पोस्ट डालने का कीड़ा लगा है, तो भला छुटेगा क्या? जब वापस आया तो यही देखा कि कहीं ब्लॉग्स पर भारत रत्न की खींचतान है, तो कोई गुजरात चुनावों का अब तक विश्लेषण कर रहा है। कोई सेंसेक्स की उछलकूद पर चिंतित है, तो कोई बिहारी होने के नफ़े-नुकसान पर। इसलिए सोचा कि अपन तो ट्रैक ही बदल लो और सीधी-सादे अंदाज़ में वापस लौटो। इसलिए ही एक लघुकथा छाप रहा हूँ...
* पागल का भोलापन...
वो रात में अकेला ख़ुद के बारे में सोच रहा था। अपने विचारों के तारों में उलझा हुआ कभी इधर खिंचाता कभी उधर। कितनी ही बातें मन में आईं और गईं होंगी। पर फिर भी उसे लगा कि कुछ सूझ नहीं रहा था। वाकई वह स्तब्ध था अपने आप से, अपने जीवन की रफ़्तार या उसके ठहराव से। वो जीवन की रफ़्तार के साथ दौड़ने को आतुर था, किंतु फिर भी कुछ देर थमना चाहता था। अपने स्वार्थ और जीवन की सच्चाई के बीच की परतों को खरोंच-खरोंच कर हटाने की कोशिशें करने लगा। और हमेशा मौन रहकर उसे समझने की कोशिश करने वाला उसका साथी उसे देखकर हँस रहा था।
वह निस्तब्ध उसे देखकर मुस्कुता रहा और फिर कुछ क्षणों बाद वह भी साथी की तरह गंभीर हो गया। वो अपनी रौशनी से अंधेरे में छिपी बातों को भाँप लेने का प्रयास कर रहा था। कुछदिनों से उसने अपने साथी को हँसता हुआ देखा था। बिलकुल बेफिक्र संसार की परवाह किए बिना, धुन में जीने वाला उसका साथी। वो साक्षी था जब वो सर्द रात में सड़कों पर हँसते हुए गाड़ी दौड़ाता था। जब बाहें फैलाकर ठंडी हवाओं को खुद में समा लेता था। सुनसान सड़कों पर गाने गाता आगे बढ़ता था। रास्ते में आने वाली हर चीज़, हर पत्थर को पीछे छोड़ने पर ठहाका लगाता था। रात्रि के अंधेरे में छत पर अकेला नाचता था। पर आज उसे ऐसा लगा कि उसका साथी ख़ुद पर हँस रहा था।
दरअसल उसे अपनी क़ीमत का एहसास हो रहा था। ऐसा नहीं था कि उससे किसी ने प्रेम नहीं किया, वो किसी का लाड़ला नहीं था, उसके दोस्त उसकी बात नहीं सुनते थे, उससे किसी बारे में बातें नहीं करते थे, वो अभी तक दोस्तों के बीच किसी पवित्र और ईमानदार बंधन में नहीं बंधा था। लेकिन इन सब के बावजूद कुछ ऐसा हुआ था जो उसके लिए बहुत नया था। कोई उसके मन की सुनना चाहता था, उसे अपनी सुनाना चाहता था। कोई उस पर विश्वास करने लगा था। अपना अक्स उसमें तलाशने लगा था। और उसे ये अजीब लग रहा था कि वह कुछ न करते हुए भी उसके चिंतक की सभी उम्मीदों पर खरा उतर रहा था। वो नहीं जानता था कि उसे आगे क्या करना है। कितनी ख़ुशियाँ बाँटनी हैं। कितना ख़ुद ख़ुश रहना है। वो तो बस वही करता जा रहा था जो उसे करना था और जो वो करता था। पर उसके ऐसे ही कामों ने उसकी इज़्जत बढ़ा दी थी कहीं न कहीं जिस पर वो विश्वास नहीं कर पा रहा था।
वो इन सबके साथ रहते हुए भी इन बातों से दूर भाग रहा था। ऐसे दुबके-दुबके कि किसी को एहसास भी न हो और वह फिर से उसी ढर्रे पर लौट आए। वही रास्ता जहाँ वह अकेले रहकर सबको ख़ुश करने का प्रयत्न करता रहता था। उसे लग रहा था कि वो जो कर रहा है किसी को दुख नहीं पहुँचाएगा। किंतु आख़िर किस-किसी को ख़ुश रख सकता था वो। उसे यह समझने में ज़रा देर लग गई थी कि किसी की ख़ुशी के पीछे किसी का दुख तो होगा ही। यही जानकार ही उसने निश्चय किया। वह अनजाने व्यक्ति को दुख न पहुँचाने के लिए प्रत्यक्ष खड़े उसके अपने अक्स के चेहरे की रंगत उसका हक़ नहीं छीन सकता था। यह अन्याय होता उसके अक्स पर और ख़ुद पर भी।
ये सब सोचकर, स्थिति को जान परखकर साथी की गंभीरता उड़ी और वह और ज़्यादा हँसने लगा। वो उसकी तरफ़ व्यंग भरी दृष्टि से देख रहा था। अब उसे हँसी आ रही थी अपने साथी के पागलपन पर, उसके भोलेपन पर। हाँ, शायद वो भोलापन ही तो था जो वो एक विश्वास के बंधन की चरम सीमा से डर रहा था। परंतु अब ऐसा नहीं था, उसने अपने स्वार्थ और सत्य के बीच की परतों को हटा दिया था। उसके मन में उस विश्वास को अभय होकर पूरा करने और निभाने की क्रांति आ गई थी। दोनों साथियों की नज़रे अचानक मिलीं, और दोनों फूट पड़े ठहाके लगाने लगे। शुरू में चुप बैठने वाला ख़ुद पर हँस रहा था। और दूसरा वाला अपने साथी के पागलपन पर उसके भोलेपन पर...।
गम्मती
पंकज
इस घड़ी
11:41 PM
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किसकी गम्मत: गम्मत -- ह्रदय की










