Monday, May 9, 2011

माँ....तू बोलती नहीं


पश्चिमी सभ्यता के दिए त्यौहारों की ही तरह व्यावसायिकता के लिए मनाए जाने वाले अनगिनत दिनों की भीड़ में मातृ दिवस भी आ गया है। वैसे तो इस मातृ दिवस पर अपनी माँ को विशकरने की परंपरा मैं पूरी कर चुका था। पर फिर भी कुछ तो कमी थी ही।
रविवार की अलसाई शाम में घर पर बात हुई। दोस्तों के साथ फ़ोन पर कई लम्हों की चीर-फाड़ भी कर डाली।  और कई दोस्तों के द्वारा अपनी माँ के नाम लिखे कई पैग़ाम और उनकी कवि‍ताओं और रचनाओं पर भी नज़र पड़ गई। ऐसे में ही एक दोस्त विपुल की एक रचना पढ़ने का मौक़ा मिला। बहुत ख़ूबसूरत लिखा था उन्होंने जो मुझे अपनी कहानी सा लगा। या कहूँ हर बेटे को अपनी माँ के लिए लिखे एक ख़त सा लगा। इस ‍कविता ने एक घाव तो कर ही दिया था। रात में अरसे बाद एक बार फिर कई मुद्दों पर बहुत ही प्यारी सी दोस्त यामिनी से बात होने से मानो उस घाव पर नमक डल गया हो।

जो टीस और दर्द उस घाव से बहा उसी को शब्दों के रूप में इस रचना में बांध दिया।

"माँ तू बोलती नहीं"

माँ...
तू कुछ कहती क्यूँ नहीं कभी,

जबकि मैं देखता हूँ तेरी आँखों में,
कितनी ही उम्मीदें मुझे लेकर,

पहले पढ़ नहीं पाता था तुझे,
अल्हड़ था, ख़ुरापाती था,
छेड़ता था मस्ती में,
और कितना सताता था तुझे,
फिर भी कुछ कहा नहीं तूने,

देर रात में आकर घंटी बजाता,
कि डाँटेगी दरवाज़ा खोलकर मुझे,
पर अलसाई आँखें लेकर तू,
बस अंदर बुला लेती थी घर में मुझे,

ज़ोर से चिल्लाता था तुझ पर,
तू जब अलसुबह उठाती थी,
फिर भी हँसते हुए तू,
मेरे लिए खाना बनाती थी,
डाँटती भी इसलिए थी
कि बस एक रोटी खाकर निकलूँ घर से,
और मैं बेशर्म सा,
तेरे बेलन की मार से बचता-बचाता
फिर भी गुदगुदाता था तुझे,

कभी टोका नहीं तूने मुझे,
देर रात तक जब फ़ोन पर बातियाता था,
अपनी कितनी सहेलियों के नाम बताता था,
पर तेरे विश्वास ने साँस दी मुझे,
क्योंकि मेरा पहला प्रेम हमेशा तू रही है,
तेरी आँखों ने कहा है मुझसे,
हमेशा-
हाँ बेटा तू सही है,
बस इसलिए ही मैं लड़ सका हूँ सबसे।

लिपटकर सोता था बचपन में तुझसे,
फिर अपनी ही
नींदों, बिस्तर और बातों में मसरूफ़ मैं,
बड़ा हो गया!
तब भी चुप ही रही तू।

रोता था अपनी चीज़ों के ग़ुम होने पर,
और तू माथे पर हाथ फेरकर,
गांभीर्य के साथ,
नसीहत की जगह तसल्ली देती थी।
और अब ज़िदगी की दौड़ भाग और भीड़ में,
जब मैं... खोता जा रहा हूँ,
तब भी कुछ कहती नहीं तू।

लंबे सफ़र में रोटी बांधकर देने पर,
ऐन मौके पर घर से निकलते हुए,
तेरी पूजा के फूल मँगवाने पर,
मेरी सलामती के तेरे लंब-लंबे उपवास में,
गणेश को मन भर चढ़ाती तेरी द्रोव रूपी घास में,
काम के बो़झ में बेतरतीब तेरे सुनहरे बालों पर,
और क्रिकेट, मोबाइल, इंटरनेट, अंग्रेज़ी से जुड़े,
बच्चों की तरह तेरे नादान सवालों पर,
मैं कितना नाराज़ हुआ हूँ तुझ पर,
माँ - फिर भी,
तूने कुछ कहा नहीं कभी,

मैं जानता हूँ कि इस एक सवाल को पढ़ती,
अपने चश्मे से झाँकती तेरी आँखें,
नम हो सकती हैं,
फिर भी कुछ नहीं कहेगी तू,

पर तेरी इस ख़ामोशी का राज़,
अब मैं समझ पाया हूँ,
कि क्यों कुछ कहा नहीं तुने कभी,
सिर्फ इसलिए ही,
क्योंकि तू "माँ" है!

~ पंकज


चित्र: गूगल और मेरा संग्रह

Thursday, May 5, 2011

आधी-अधूरी एक कविता के पूरे होने से लेकर एक नई कविता की रचना तक की गम्मत


पिछले हफ्ते से गम्मती हर रोज़ रात में एक उम्मीद लेकर बैठ रहा था कि फिर कुछ शुरू किया जाए। फिर कुछ शब्दों को काग़ज़ पर कत्ल किया जाए। कुछ नए विचारों को जन्म दिया जाए। और सहलाया जाए उन भावानाओं को दिल की सतह पर आती जाती रही। पर हमेशा की तरह बारिश बंजर ज़मीन पर नहीं बरसती है। ठीक उसी तरह बस सोचने से ही कुछ लिखना भी मुनासिब नहीं जैसा कि मैं हमेशा ही कहता रहता हूँ।

मेरी डायरी के पन्नों में या फिर टेकसैवी होने की हैसियत से यह कहूँ कि लैपटॉप की कुछ फ़ाइलों में कुछ आधी-अधूरी सी पंक्तियाँ पड़ी हुई हैं। परसो रात उन्हीं में से कुछ पंक्तियों को पूरा किया जो यहाँ पर आजा कभी तोशीर्षक के साथ है। फिर जब रंग चढ़ गया और फ्लेवर आ गया (आज शाम दिल्ली की गर्मी में चॉकलेट आइसक्रीम खाई थी, शायद इसलिए फ्लेवर शब्द का इस्तेमाल हो गया) तो फिर कल रात मैसेज टाइप करते रहने के अंजाम में कुछ-कुछ फिर लिख दिया। अब यह कुछ-कुछ भी तो पढ़वाना ही पड़ेगा ना आप सभी को। तो यह भी हाज़िर है, शीर्षक नींद नसीबीके साथ।
हमेशा की तरह आपके शब्दबाणों की चाह रहेगी।


"आजा कभी तो...."

के आजा इक रोज़, तो तुझे पहलू में रख लूँ अपने,
अरमान कुछ मैं देख लूँ, और कुछ पूरे कर दूँ सपने।

यूँ तो तेरे आने की राह कभी देखी नहीं है मैंने,
तू क्या जाने तेरी आहट में गुज़रे है पल कितने।

कि जायज़ है तेरी नाराज़ी यह मैं भी मानता हूँ,
तेरी हंसी के वास्ते, मुझसे गुनहगार लगे है बिकने।

कैसे मांग लूँ इश्क में तुझे अपनी मुराद समझकर,
जब ख़ुदा काली स्याही से लगे मेरा मुकद्दर लिखने।

तेरी यादों को समेट के दामन में छुपा लिया है यूँकि,
बैठा है आजकल वक्त मेरी ख़शियों का हिसाब करने।

~ पंकज 

"नींद नसीबी"

मुझे चैन की नींद सोना है,
सिरहाने बिना किसी तकलीफ़ या उलझन के,
आँखों में बिना किसी बेतरतीब से स्वपन के,
बिना, सीने में जलती तपन के,
और आँखे नम करने वाले ग़म के,

मुझे सोना है एक गहरी नींद,
जहाँ बंद आँखों के पीछे,
कोई स्याह परछाई ना हो,
किसी दिल की रूसवाई न हो,
नम आँखों की परतों पर जमी,
चिपचिपे आँसूओं की काई ना हो,
और तिस पर भी,
ख़ुद की ख़ुद से की बेवफ़ाई ना हो,

मुझे चाहिए एक ऐसी ही गहरी नींद,
पर इन आँखों में छुपा दर्द,
यूँही सोने नहीं देता,
मुस्कुराकर जीते रहने के वादों का,
वो भारी सा एक पुलिंदा,
बेफ़िक्र हो रोने भी नहीं देता,
मुझे किसी एवज़ में तुम उधार दे दो,
अपनी सादगी-प्यार भरी आँखें,
के शायद इन्हीं की सच्चाई से,
मुझे नींद नसीब हो जाए।

~ पंकज

चित्र: साभार गूगलश्री से

Tuesday, March 15, 2011

पाठ पुस्तक के... सीख जीवन की...


गम्मती के साथ हर सफ़र में कहानी होती है... और कभी कुछ नहीं होता है तो कहानियाँ पढ़ने बैठ जाता हूँ। अभी हाल ही में कुछ उलझे मामलों का सामना करने और ख़ुद की उलझनों को लेकर इंदौर जाने का मौका बन पड़ा। सब कुछ ठीक रहा, ठीक वैसा जैसा किसी शक्ति ने सोचा था शायद वैसा हो गया। शुरू के चार दिन उसी शक्ति के फ़रमान को मुस्कुरा कर मानने में निकल गए। फिर दिल्ली वापस लौटने की ताक़त नहीं बची थी। तो दो दिन घर पर रूक गया। दिल्ली लौटने के लिए रविवार का दिन मुकर्रर हो गया था। सो, तय समय पर ट्रेन पकड़कर अपनी सीट पर जम बैठा।

पिछले दो-तीन महीनों में रिश्तों के मकड़जाल के बीच उलझते और घुटते और परेशान होते दोस्तों को महसूस किया था। और ख़ुद भी इसी उलझन का हिस्सा भी बन गया। अब तो कई किस्से अपने मुक़ाम तक पहुँच भी गए। हमेशा रिश्तों को हम कच्ची डोर मानकर बनाते हैं। लेकिन जब उस कच्ची डोर में कहीं कोई बल आता है और वो टूट जाती है तो हम उसके बचे-खुचे रेशों तक को देखने तक से कतराने लगते हैं। हम जब भी अपने घर में एक सुंदर शोपीस सजाते हैं तो उसे देखकर ख़ुश होते हैं, लोगों को भी दिखाते हैं, तारीफ़ भी पाते हैं। लेकिन जब उस पर थोड़ी सी खरोच या टूट-फूट होती है तो उसे हटा देते हैं। लेकिन कभी-कभी हम उसकी जगह पर जमी धूल को हटाने की कोशिश नहीं करते हैं जो बाद में उसी जगह को दाग़दार कर देती है जहाँ कुछ दिन पहले एक नुमाइशी पसंदीदा चीज़ हुआ करती थी। रिश्तों का भी खेल कुछ ऐसा ही है। कुछ कारणों से ग़र टूट भी जाते हैं तो हम उसकी धूल तक को हाथ नहीं लगाते हैं, क्योंकि हम उसे पूरी तरह ख़त्म कर देना चाहते हैं। यहाँ तक कि उसकी अच्छी यादों को भी...
 ख़ैर, सफ़र के दौरान रात में पुस्तक पढ़ने का मन किया तो कॉलेज में विजेता बनने पर उपहार स्वरूप मिली पुस्तक को खोल लिया। सामने जो पृष्ठ आया उसे पढ़ना शुरू किया। इत्तेफ़ाक मेरे साथ बहुत होते हैं- इस आलेख को पढ़ेंगे तो आप भी समझ जाएँगे कि जो कुछ भी इस दौरान हुआ है वो सब इस आलेख में झलकता है जिसे पढ़कर मुस्कुराते हुए मैं नींद के पहलू में चला गया। उसी दौरान एक मित्र का फ़ोन आया और उसने सीधे यह पूछा कि "इतनी जल्दी सो गए, क्या इस बार कुछ पढ़ने के लिए नहीं ले गए हो?" तब मैंने कहा था कि दिल्ली पहुँचते ही सबको पढ़वाउँगा, क्योंकि यह सबसे जुड़ेगा। वही आलेख आप सभी लोगों के लिए यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ...आलेख से मैं सहमत हूँ और इसके संबंध में मेरा अनुभव तो ऊपर पढ़ ही लिया है... आप अपना अनुभव नीचे ज़रूर बताइएगा।


Happily Even After

Use no relationship to hold you to the past,
But with each one each day be born again.
- A Course in the Miracles

On Father's day, My friend Danielle took her two former husbands out to dinner. “I wanted to honour the two most important men in my life,”she told me. “They are the fathers of my children, and we are all related.” I respected and honored Danielle for keeping her former mates in her heart and acknowledging the good they had brought into her life.
Most of us are taught that when a relationship is over, both parties go their way upset; one is the villain and the other a victim. But what if suffering is optional? What if we can create our partings in any way we choose? What if we don’t have to separate in anger or guilt, but go on to enjoy a friendship that lasts a lifetime and beyond?
We can let go of our old models of isolation and separation and replace them with kindness, caring, intimacy and support. Because we are spiritual beings, it is not what our bodies do that determines the quality of our lives, but the state of our spirit. Although our bodies may go in different directions, we can remain whole and joined in the heart. The end of a marriage or a relationship does not mean end of love. True love spans far beyond the boundaries we have laid over it, and it does not die; it simply goes on gathering force until everyone and everything we look upon is blessed by our appreciation of each other as gifts from God.

I pray to honor the people in my life no matter what the voice of fear tells me. I will give love no matter what.

My relationships reflect the love of God.
 चित्र: गूगल-गूगल

Monday, February 28, 2011

"मैं..."


लिखने के विचार कुछ और थे लिख कुछ और ही डाला। दो-तीन हफ़्तों पहले बमुश्किल 36 घंटों के लिए अपने गृहनगर का रूख़ किया था। तब उस मिट्टी की महक, अपने मोहल्ले के शोर-शराबे और अपनी गाड़ी पर चलते हुए लगने वाली मालवा की आबोहवा ने दिल्ली के बारे में अपने विचार लिखने का बीज मन में बो दिया था। पर दिल्ली आकर व्यस्तता के चलते उस बीज में शब्दों का खाद पानी डालने का मौका ही नहीं मिला।

आज लिखने बैठा भी तो कुछ पुरानी अधूरी पंक्तियों को अस्तित्व प्रदान कर दिया। कभी लगता था कि कुछ सवालों के जवाब देने की ज़रूरत नहीं होती, क्योंकि उनका उत्तर समझा जा सकता है। लेकिन कभी-कभी जवाब तो देना होता है लेकिन बहुत से सवालों के जवाब देना आसान नहीं होता। पर शब्दों से खेलते हुए हर चीज़ आसान सी लगने लगती है। चाहे दाँत फ़ाड़कर मुस्कुराना हो या फिर जिंदगी जीने और ख़ुशियाँ बाँटने की बातें करना। आज शायद दो कविताएँ लिख दी हैं - एक तो यहाँ प्रस्तुत है। और दूसरी जो एक मित्र को मैसेज पर बातों बातों में लिखकर भेज दी। सोचता हूँ कि बातों-बातों में कही गई पंक्तियों और कविताओं का भी भण्डार है मेरे पास जो मैंने लिखकर सुरक्षित भी रखा है। लेकिन फिलहाल के लिए इस रचना को समय दीजिए...


"मैं..."

दर्द भी देता हूँ, अपनों को दवा भी देता हूँ,
मेरे दुश्मनों को देखो मैं दुआ भी देता हूँ,

शोलों से खेलने का शौक रहा नहीं मुझे,
पर सुलगती चिंगारियों को हवा भी देता हूँ।

ग़म-ए-इश्क कोई और दे ऐसा ज़रूरी नहीं,
मैं ख़ुद को ख़ुद से प्यार की सज़ा भी देता हूँ।

दिल तोड़ना तुम्हारे वास्ते ख़ुदा का कुफ़्र सही,
इसी ख़ता की अपने ख़ुदा से मैं रज़ा भी लेता हूँ।

बेशक तुम्हारी तमाम उम्मीदों से वाक़िफ़ हूँ मैं,
क्यों समझती नहीं जब आँखों से बता भी देता हूँ।

तकल्लुफ़ नहीं कि इस चेहरे पर नक़ाब हैं कई,
हर चेहरे को अपने मैं जीने की वजह भी देता हूँ।

ये कैसी उलझन तेरी जिसकी कोई वजह ही नहीं,
कभी आकर मिल तुझे कुछ यादों का पता भी देता हूँ।

अपनों की तमन्नाओं को जीना ही ज़िंदगी है मेरी,
इसलिए ही ख़ुद के अरमानों को अब दग़ा भी देता हूँ।
दर्द भी देता हूँ, और 'ख़ुद' को दवा भी देता हूँ...

~ पंकज


चित्र: साभार गूगल जी के ज़रिए।

Saturday, January 8, 2011

काग़ज़ का एक टुकड़ा...

नए साल का पहला दिन और दिल्ली की सर्दी मे धूप सेंकते हुए लोग! ऐसे ही शुरू हुआ है यह नया वर्ष।
दिल्ली में रहकर कभी नए साल का स्वागत करने का मौका आएगा यह सोचा नहीं था। हर नए साल की पूर्वसंध्या पर दोस्तों के साथ गर्मागर्म केसरिया दूध पीकर, इंदौर की सड़कों पर घूमने और राजवाड़ा के नज़ारे और माहौल देखने से फ़ुरसत ही किसे थी।
ख़ैर नए साल की शुरूआत में ही पहले सेमेस्टर की परीक्षाओं की तैयारी करने के सुविचार आने लगे थे। इसी सिलसिले में 1 जनवरी को ही दोस्तों के साथ घर पर बैठे थे। पढ़ाई के पन्नों के बीच अचानक एक कोरा काग़ज़ हाथ में आ गया।
लिखने के विचार ऐसे ही टूटते तारों की तरह अचानक से अंधेरे में रौशनी करते हुए आ जाते हैं। सो, अपनी याददाश्त पर पूरा भरोसा करते हुए, चिल्लाते हुए उसी वक़्त लैपटॉप पर दो पं‍क्तियाँ लिख कर रख ली थीं। ;)

सात दिनों के बाद अब वही विचार पूरी तरह सँवारने का प्रयास किया है।


काग़ज़ का टुकड़ा...

यूँ ही उड़ते हुए हाथ लगा,
एक काग़ज़ का टुकड़ा बिलकुल कोरा,
रेगिस्तान सा वीरान,
सोचा पलट कर देखूँ,
पर दूसरी ओर भी सुनसान,


सोचा लिख दूँ अपनी कोई कहानी इस पर,

या एक नज़्म ही उकेर दूँ,
अपनी उर्दू के लिफ़ाफ़े से निकालकर,
किसी अजनबी के नाम प्रेम पत्र लिखूँ?
या फिर चिट्ठी लिख दूँ घर पर,
कि बहुत दिन हुए माँ तुम्हें देखा नहीं है।
या अपनी मासूम बेटी के हाथ थमा दूँ,
शायद वो ही इसे काला कर दे क्योंकि,
वो भी अपनी लकीरों से खेलने लगी है,
क्यों न सँभालकर रख लूँ कल तक,
और सुबह का कचरा इसी में दफ़ना दूँ,
कहो तो इसी पर दोस्तों के नाम,
अपनी सारी ख़ुशियों की वसीयत बना दूँ,

लेकिन...
बचपन में सुना था कि,
प्याज़ की स्याही से लिखकर,
काग़ज़ को आँच दिखाने पर,
सुर्ख़ लाल अक्षर उभर आते हैं।
सोचा क्यों न इस कोरे काग़ज़ पर,
लिख दूँ अंतरमन की सारी भावनाएँ,
मैं भी अपने आँसूओं से!!!
किसी ह्रदय में कभी तो आग लगेगी,
संभवत: तब मेरी भावनाएँ,
इस काग़ज़ के मानिंद कोरी न रहेंगीं!!!

~ पंकज


चित्र: गूगल

Thursday, December 23, 2010

शब्दों के मोल - सो... सोच समझ कर बोल!

शब्द - हर एक शब्द का अपना मोल है। कई मतलब हैं, कई भाव हैं।

कल एक वाकये ने इन्हीं शब्दों के मोल के ऊपर कुछ लिखने पर मजबूर कर दिया। कुछ लिखकर दोस्तों के बीच साझा किया। शायद उन चंद शब्दों का असर प्रभावी रहा। शावर की नॉब खुलते ही झर-झर बरसती पानी की बूँदों की तरह कई सवाल मेरे सामने आ गए। मेरे शायराना मिज़ाज़ का अचानक परवान चढ़ने का सबब पूछा जाने लगा? मुझसे मेरी ख़ैर-ख़बर ले ली गई? स्वास्थ्य के हालात से लेकर दिल की तबीयत तक की बातें उगलवाने के लिए लोगों के मैसेजेज़ और फ़ोन आने शुरू हो गए? जब दो पंक्तियों का असर ऐसा रहा, तो रहा न गया। वो शब्दों का सिल‍सिला आगे बढ़ाने का मन किया।

शुरूआत दो पंक्तियों से हुई, और अंजाम तक आते-आते एक कविता की रचना भी हो गई। उसी को नज़र कर रहा हूँ!!!


~ शब्द ~

कभी सोचा था...शब्द बहुत कीमती हैं!
आज कुछ बोलकर, नुकसान कर लिया।


बनिये की तरह तोलकर रखे थे,
कुछ हल्के, तो कुछ भारी,
कोई बस एक लफ़्ज़ भर है,
किसी में छुपी है कहानी सारी,
कुछ शब्द रेशम में लिपटे रखे हैं,
कुछ कटु-कठोर से,
बेतरतीब बेपरवाह पड़े हैं।
इनकी दुकान खोलकर, नुकसान कर लिया।
आज कुछ बोलकर, नुकसान कर लिया।


अलग-अलग रंगत है शब्दों की,
कुछ सोच ही में रहकर परेशाँ करते हैं,
तो कुछ बरबस यूँ ही निकल पड़ते हैं,
स्नेहिल से मीठे-मीठे कुछ,
सभी को रास आते हैं,
कुछ अपनी कड़वाहट से कभी,
रिश्तों पर भारी पड़ जाते हैं।
उलझा देते हैं कुछ - पहेली जैसे,
शब्द एक - मतलब कई,
आख़िर ठीक समझें, तो कैसे? 
वहीं, शब्द कुछ सटीक से,
झट से स्पष्ट हो जाते हैं।
काँटों से चुभते भी हैं,
और फुलों की तरह मुरझाते हैं।
ये शब्दज्ञान टटोलकर, नुकसान कर लिया।
कुछ शब्दों को खोकर, नुकसान कर लिया।
आज ज़रा कुछ बोलकर, नुकसान कर लिया।

~ पंकज

Tuesday, September 28, 2010

लाइफ़ एट मेट्रो - भाग दो




मेट्रो स्टेशन पर ज़िंदगी की दौड़-भाग देखते हुए काफ़ी समय हो गया था। मेट्रो में चढ़ती-उतरती भीड़ की हरकतें, उनकी कतारें, किसी का गिरना-टकराना इन सबके बीच में मेट्रो ट्रेन मेरे विचारों के बीच से कहीं खो सी गई थी। अब मेट्रो ट्रेन मेरे केंद्रबिंदु पर थी। हमेशा लंबी-चौड़ी ट्रेनें देखी थी। लार रंग की, नीले रंग की, या फिर राजधानी या केरल एक्सप्रेस की तरह रंग बिरंगी। ऐसे में धूसर रंग में चमचमाती मेट्रो ट्रेन जब पहली बार देखी थी तभी भा गई थी। सिलेंडर के आकार की ये तेज़ गाड़ी देखने में बहुत अच्छी लगती है।
हॉलीवुड की फ़िल्मों में देखी थी मेट्रो टेन जो आगे से एक दम नुकीली होती है ताकि डायनेमिक्स के नियमों के विरूद्ध वो हवा को काटती बहुत तेज़ी से दौड़े। यहाँ की मेट्रो ट्रेन आगे से एकदम सपाट है। ध्यान से देखा जब तो मैंने कल्पनाओं में ही इसे बिल्कुल कार्टुन नेटवर्क पर आने वाले बच्चों के बेसिरपैर के कार्टून धारा‍वाहिकों से जोड़ लिया। वैसी ट्रेन जिसके आँख, नाक, कान, मुँह सब होता है और वो बात भी करती है। दिल्ली मेट्रो की बनावट में भी मुझे वही दिखाई देने लगा। आगे दो बड़े-बड़े काँच और उनके नीचे छोटी-छोटी लाइट्स जैसे दो आँखों का अनुभव करा रही थी। उनके ठीक बीच में दिल्ली मेट्रो का लोगो गोल-गोल नाक की तरह दिखता है। और रही मुँह की बात तो वो भी दिखाई दे गया। मेट्रो पर आगे लगी लाइट्स और उसके लोगो के आस-पास चाँदी के रंग की एक मोटी सी लाईन ऊपर से होती हुई नीचे तक आती है बिल्कुल अंग्रेज़ी के यू अक्षर की तरह जो एक बच्चों की रेल के मुँह जैसा अनुभव देती है। नीचे बड़े-बड़े अक्षरों में “BOMBARDIER” लिखा है। जैसे बच्चों की ट्रेन पर ब्रांड का नाम होता है ठीक वैसे ही। बच्चों की ट्रेन देखकर तो ख़ुशी होती थी। इसे देखकर ख़ुशी तो होती है लेकिन डर भी लगता है कि कहीं ये कार्टून फ़िल्मों की वो गंदी वाली ट्रेन न हो जो सबको खा जाती है।

इस रेल के डिब्बे या फि़र मेट्रो क्यूब्स कहें, ऐसे आयत आकर के हैं। बचपन में घर बनाने के लिए यही आकार सबसे ज़्यादा काम आता था। चार-आयत बनाए दीवारों के, फिर दो और खिड़कियों के लिए और एक से दरवाज़ा बन जाता था। मैंने मेट्रो के क्यूब्स में भी एक घर देख लिया जिसमें दो आयत दरवाज़ें है और दो बड़ी-बड़ी सी खिड़कियाँ भी हैं। वैसे इस मेट्रो की बोगी में 4 गेट होते हैं और दो दरवाज़ों के बीच में मेट्रो के दो लोगों बने हैं। ऊपर से देखो तो इस तरह लगता है जैसे गाँवों में घरों पर लगने वाले खपरैलों को अच्छे से सज़ा कर एक लाइन में मेट्रो के ऊपर लगा दिया है। ऊपर छत पर ही इलेक्ट्रीक सिस्टम इंस्टॉल है जो इसे बिजली से चलने में मदद करता है। और इन ख़परैलों के नीचे बड़े-बड़े एसी सिस्टम्स लगे होंगे। वैसे हद ही हो गई कहाँ मेट्रो की छत और कहाँ गाँव में घरों के ऊपर बिछने वाले ख़परैल। ये मन भी दो चीज़ों के बीच में जाने कहाँ-कहाँ से क्या तालमेल बैठा लेता है।
मेट्रो के गेट खुल गए अचानक जब मैं उसकी बाहरी बनावट को देख रहा था। कुछ मेट्रो में दरवाज़ों के ठीक ऊपर एक पीली ब‍त्ती जलती है। जब भी वो दरवाज़ें खुलने या बंद होने लगते हैं, तब वह बत्ती जलती-बुझती है। इस देखकर मुझे रामायण में ताड़का राक्षसी की याद आ गई। जब हनुमान उसके मुँह के अंदर जाते हैं तो ताड़का का मुँह भी ऐसे ही खुलता और बंद होता है। पहले के स्पेशल इफ़ेक्ट्स को देखना कितना मज़ेदार होता था। अगर रामानंद सागर ने ताड़का की आँखों में इस तरह का लाइट इफ़ेक्ट डाला होता तो वो और भी भयानक लग सकती थी। ख़ैर अब तो सबकुछ संभव है।
अचानक से एक और मेट्रो स्टेशन पर प्रवेश करती है। जब भी मेट्रो आती है तो लगता है सुरंग में से अचानक से किसी ने कोई गोला छोड़ा है जो आकर सीधे आपकी जान लेने वाला है। और जब ये स्टेशन पर आकर ब्रेक लगाती है तो लगता है जैसे 1000 घोड़ों की लगाम एक साथ खींच दी गई है।
मैं जब स्टेशन पर आया था तब यहाँ कानों में कुछ अजीब सी आवाज़ के कारण सनसनी होने लगी थी। अब इतनी देर के बाद वो आवाज़ भी नहीं सुनाई दे रही है। शायद इतनी देर यहाँ रूकने का असर है। हम आदी हो जाते हैं इस तरह ही चीज़ों के कुछ ही देर में। आवाज़ों के साथ, रिश्तों के साथ, इंसानों के साथ, दोस्तों के साथ, अपनी गाड़ी के साथ। शायद यही मनुष्य की प्रवत्ति होती है।
इतना गंभीर होना ही था कि ध्यान फिर ज़िंदगी पर चला गया। सामने ब्रिज पर दो लड़के हाथों में हाथ डाले मस्ती में बातें करते, हँसते हुए चले आ रहे थे। उनके बारे में कुछ ग़लत न सोचने की इच्छा रखते हुए भी मन में सेक्शन 377 और गे राइट एक्ट का पूरा मसला घूम गया। कितना हव्वा बन जाता है समाज में कि आप कितने ही उदारवादी सोच के हों, चाहे जितनी खुले दायरे का सोच रखते हों फिर भी मज़ाक और व्यंग में ही सही आप वो बातें सोचने लग जाते हैं जो सामान्यत: आप नहीं मानते हैं। इस तरह की बातों को इतना बढ़ा-चढ़ा दिया जाता है कि हम आदी हो जाते हैं। शायद वही मनुष्य प्रवृत्ति वाला नियम यहाँ पर भी लागू हो गया है।
अब काफ़ी देर हो गई है मेट्रो के बारे में देखते हुए। और मैं भी यहाँ खड़ा किसी ट्रैफ़िक हवलदार से कम काम नहीं कर रहा हूँ। जिसको देखो सीधे मेरे सामने आकर खड़ा हो जाता है और रास्ता पूछने लगता है। कभी-कभी तो चिढ़ होने लगती है। अरे आप पढ़े-लिखे हैं सामने पढ़ लिजिए अगर वहाँ नहीं समझ आता है तो पूछिए न। वैसे ये चिढ़ एक ही साथ थोड़े ही समय में बहुत सारे लोगों द्वारा रास्ता पूछने के कारण हो गई है। वरना सामान्यत: तो मैं ऐसा नहीं हूँ। सच है एक ही जगह बहुत देर ‍बुत बनकर खड़े रहने से अपने स्वभाव में भी परिवर्तन आ ही जाते हैं।



मेट्रो ट्रेन की बाहरी काया के दर्शन ने तो कल्पनाओं को अलग ही पर दे दिए थे। अब समय था कि ज़रा देर मेट्रो के अंदर के भाग को भी महत्व दिया जाए। हमने वहीं ब्रिज के ऊपर से ही मेट्रो के अंदर के माहौल को भाँपने की कोशिश भी की। पहली मेट्रो जैसे ही आई थी और जो भीड़ मेट्रो से निकलकर प्लेटफ़ॉर्म पर फैल गई थी मन में आया कि अब दिल्ली की हाईटेक मेट्रो और मुंबई की लोकल ट्रेनों में ज़्यादा अंतर नहीं रह गया है। सुबह और शाम को कार्यालयीन छुट्टी के समय मेट्रो में भीड़ का अंदाज़ा लगाना कठिन ही होता है। इन समय आप मेट्रो में आराम से यात्रा कर सकेंगे ये सोचना अब तो बेमानी ही होगी। पहले आरामदायक यात्रा की पहचान बन चुकी मेट्रो भी अब भीड़ की मार झेल रही है। जिधर देखें ऊधर आपको भीड़ दिख जाती है – मेट्रो स्टेशन पर, प्लेटफ़ॉर्म की लंबी कतारों में, या फिर मेट्रो के अंदर भी।
मेट्रो के अंदर की बात की जाए तो सुबह और शाम के समय में यनि मेट्रो के अंदर देखें तो आपको मेट्रो की छत पर लगे पाईप्स और हैंडल पर हाथ ही हाथ दिखाई देंगे। एक दूसरे में गुँथे हुए और उलझे हुए हाथ। यही हाल मैंने तब भी देखा था जब मैं दिल्ली पहली बार आया था और ब्लू लाइन बस में यात्रा की थी। इन दोनों दृश्यों में अंतर केवल आम लोगों का था। ब्लू लाइन में यात्रा करने वाले एक अलग वर्ग के लोग हो गए हैं और मेट्रो का एक अलग वर्ग बन गया है। हालाँकि दोनों ही साधन किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है।
इतनी भीड़ में अंदर नज़र तो चली ही गई थी। एक लड़के को देखा अचानक तो वो भीड़ में गेट पर जैसे-तैसे खड़ा तो हो गया फिर अपना हाथ बाहर निकालने की कोशिश करने लगा। थोड़ी मशक्कत के बाद उसने अपना हाथ भीड़ में से निकाला और अपने सीने पर लगे मोबाइल के हैंड्सफ़्री का बटन दबाया और बात करने लगा। सच में यदि इतनी भीड़ में किसी का मोबाई‍ल बज भी जाए तो उसे उठाने में कितनी दिक्कत होगी। चलिए, मोबाइल उठाने की बात तो ठीक है, इतनी भीड़ में यदि किसी को खाँसी या छींक आ जाए तो क्या हो? आस-पास खड़े लोगों की डाँट सुनने को मिलेगी और साथ में असभ्य होने का ठप्पा लगा दिया जाएगा सो अलग। पर इतनी भीड़ में आख़िर कोई करेगा भी तो क्या। वैसे इन बातों का फ़ायदा सामान वाले यात्री को हो सकता है। वो ख़ुद और उसका सामान मेट्रो के अंदर की भीड़ की धक्कामुक्की की बदौलत अपने आप ही भीड़ में अपनी जगह बना लेगा।
मेट्रो में वाकई बहुत भीड़ हो गई है। मुझे याद आ रहा है जब पहली बार मैंने मेट्रो में सवारी की थी, तब तो मैंने बैठकर यात्रा की थी। और एसी की ठंडी हवाओं से ऐसा लग रहा था जैसे होटल की लॉबी में बैठकर किसी की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। किंतु अब तो ऐसा नहीं लगता है, कभी-कभी तो शक होने लगता है कि मेट्रो में एसी चालू अवस्‍था में है भी या नहीं। अंदर भीड़ के बीच में फँसकर खड़े होता हूँ तो घुटन होने लगती है। कभी ताज़ी हवा में साँस लेना भी होती है तो अपनी ऊँचाई का लाभ लेकर सिर ऊपर करता हूँ और साँस ले लेता हूँ। अभी तो मुझे मेट्रो के अंदर कोई भी ऐसा करता नहीं दिख रहा है ।
मेट्रो के अंदर देखने पर ऐसा लग रहा है जैसे किसी ग्लास हाउस को देख रहा हूँ। एक ऐसा ग्लास हाउस जिसमें आप ताज़गी नहीं महसूस कर सकते हैं। हाँ ग्लास हाउस तो बहुत खुला-खुला सा अनुभव दिलाता है। मैंने अपने मोहल्ले में अभी-अभी बना एक ग्लास हाउस देखा है। पर अभी तक वहाँ कोई रहने नहीं आया है। उस घर को देखकर हमेशा यही याद आता है कि काश! उस घर के मालिक ने बाहर या अंदर कुछ पौधे लगा दिए होते। पता नहीं अब वहाँ पर क्या हाल होगा। मैंने तो पिछले एक महीने से उस जगह को नहीं देखा। ख़ैर जब मैं अपना घर बनाऊँगा तो इन बातों का ज़रूर ख़्याल रखूँगा।
हाँ, तो मैं मेट्रो के अंदर देख रहा था। पर लोगों के अलावा ज़्यादा कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। मैंने ख़ुद अंदर बैठकर जो देखा है वही सब याद आ रहा है। एलईडी पर चलते हुई उद्घोषणाएँ, मेट्रो के गेट पर लगे रूट मैप्स, साइड में लगे विज्ञापन, हैंडल पर चिपके स्टिकर्स, एक दूसरे से बतियाते लोग, चुपचाप कान में हैडफ़ोन लगाए संगीत की धुन में खोए लोग, या फिर इतने शोर या भीड़ में भी पुस्तक पढ़ते लोग। क्या पता वाकई पढ़ते भी हैं या ढोंग करते हैं। मैं तो ऐसा नहीं कर सकता। वैसे सोचा ज़रूर है कि मेट्रो में पढ़ने की शुरूआत की जा सकती है।
वैसे मेट्रो के अंदर अगर घर बना लिया जाए तो मनुष्यों का हाईटेक इग्लू जैसा लगेगा। हाँ, क्यों नहीं हो सकता। जब हाउसिंग बोट्स हो सकती हैं तो रेल की पटरियों पर दौड़ने वाला घर भी तो बनाया जा सकता है।

अरे!!! घर तो मुझे भी जाना है और 9.15 समय हो गया है। मेरी ट्रेन का समय 10 बजे का है तो मुझे दौड़ना चाहिए। इतने समय से बस मैं ही जड़ होकर खड़ा हूँ पूरे मेट्रो स्टेशन पर बाक़ी सब तो दौड़ती-भागई ज़िंदगी का शिकार हैं। अब मुझे भी शिकार हो जाना चाहिए और दौड़ लगानी चाहिए वरना मेरी ट्रेन छूट जाएगी।


मैंने एक बार कहीं पढ़ा था – “You can observe a lot just by watching.” और ठीक इसके विपरीत “You can see a lot just by observing.” वाकई आज जब असाइनमेंट करने के‍ लिए रवाना हुआ था तब यही पंक्तियाँ थीं मन में कि जो भी दिखाई देगा उसे देखेंगे और देखकर ऑब्ज़र्व भी किया जाएगा। इस असाइनमेंट को लेकर शुरू से जो उत्साह था, वो इसका आख़िरी शब्द लिखने तक बना रहा।
असाइनमेंट की शुरूआत में यही तय किया था कि जो कुछ भी देखूँगा उसके नोट्स क़ाग़ज़ पर उतार लूँगा और बाद में उसे आराम से टाइप किया जाएगा। किंतु एक अलग ही अनुभव हुआ ये असाइनमेंट लिखते हुए भी। जैसे-जैसे अपने नोट्स को पढ़ता जा रहा था और उस वाकये को टाइप करता जा रहा था ऐसा लग रहा था जैसे मैं अभी भी रात के 8-9 के बीच में राजीव चौक स्टेशन पर मूरत की तरह खड़ा हूँ और वो सब घटित हो रहा है। वो ऑब्ज़र्वेशन करते समय ऐसा लग रहा था जैसे दुनिया में मेरा अस्तित्व ही नहीं है। क्योंकि सब कोई इधर-उधर भाग रहे थे बस मैं जड़वत अपनी जगह पर खड़ा सबको देख रहा हूँ। क्या किसी ने मुझे नहीं देखा था।
जैसा कि मैंने असाइनमेंट की शुरूआत में भी अनुभव किया कि जो मैं कर रहा हूँ अगर किसी ने मुझे ये करते देखा तो मुझसे कई सवाल पूछे जा सकते हैं और उनका जवाब देना भी मेरा उत्तरदायित्व होगा। लेकिन एक घंटे का समय कब निकल गया मालूम ही नहीं चला। एक और अंग्रेज़ी लाइन है कि - "He alone is an acute observer, who can observe minutely without being observed.” मैं भी कहीं खो गया था ये काम करते हुए शायद इसलिए ही मेरा अस्तित्व भी किसी को दिखाई नहीं दिया, सिवाय उनके जो आ-जाकर मुझसे हर समय रास्ता पूछते रहे।
यूँ तो कुछ देर अगर लिखने को कह दिया जाए तो हालत ख़राब हो जाती है। हमारी पढ़ाई में वैसे भी लिखने की आदत तो स्कूल के बाद से बहुत कम हो जाती है। और जब यह असाइनमेंट किया तो मुझे ख़ुद आश्चर्य हुआ ये देखकर कि मैं लगातार एक घंटे तक अपनी नज़रे इधर-उधर दौड़ाता रहा और लगातार लिखता भी रहा। जब अंतत: एक घंटा पूरा हुआ तब जाकर ध्यान गया कि अब हाथों में और उंगलियों में दर्द हो रहा है। वरना तो वो एक घंटा पूरी तरह बाक़ी किसी भी चीज़ का होश नहीं रहा। मैं तो ये तक भूल गया कि कहीं कोई मेरे पैर के पास से मेरा बैग उठाकर भाग तो नहीं गया।
असाइनमेंट के दौरान ही जब बार-बार लोगों ने रास्ता पूछा तब अपने व्यवहार के बारे में भी कुछ देखने समझने को मिला। कैसे एक ही बात कुछ ही अंतराल में यदि बार-बार दोहराई जाती है तो हम विचलित हो सकते हैं। किसी अनजान व्यक्ति को रास्ता दिखाना वैसे तो बहुत अच्छा लगता है और भलाई का काम भी है। लेकिन उस दिन कोफ़्त होने लगी थी। ऐसा लग रहा था जैसे ये लोग जानबूझकर मेरे काम में बाधा डाल रहे हैं।
इसके अलावा ही यह भी जाना कि कैसे हमारा मन और हमारा शरीर शांति से खड़े रहने पर किसी भी गतिविधि में भाग न लेने पर कहीं तल्लीन होने पर बस उसी में खो जाता है। मेट्रो पर जो आवाज़ें अंदर जाते ही परेशान कर रही थीं, वो कुछ देर बाद सुनाई देना भी बंद हो गई थीं। हमारा शरीर आस-पास के वातावरण के साथ बहुत जल्दी तालमेल बैठा लेता है।
अब इतना तो साफ़ हो ही गया है कि जो ऑब्ज़र्वेशन एक आदत मात्र था उसे करने के और भी कई तरीके हो सकते हैं। और इस प्रकार के विशेष ऑब्ज़र्वेशन के नतीजे भी अलहदा ही होते हैं।

इति दिल्लीदेशे मेट्रो अध्याये ऑब्ज़र्वेशन पाठ समाप्त!!!

चित्रों के लिए Google देव और MS Word महाराज की जय!